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आखिर क्यों जरूरत पड़ी चीता को भारत लाने की, इनके नहीं होने से क्या नुकसान था?

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नई दिल्ली,

चीता दुनिया का सबसे तेज भागने वाला जानवर. अधिकतम गति 120 किलोमीटर प्रतिघंटा. 1948 में खुले जंगल में तीन चीतों का शिकार किया गया. जगह थी छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले का साल जंगल. 1952 में चीतों को विलुप्त घोषित कर दिया गया. घोषणा स्वतंत्र भारत के पहले वाइल्डलाइफ बोर्ड मीटिंग के बाद की गई थी. 70 साल तक देश में चीते नहीं थे. फिर अचानक चीतों को भारत लाने की क्या जरुरत पड़ गई. सब ठीक तो चल रहा था. नहीं सब ठीक नहीं था. आइए जानते हैं क्यों?

ऐसा नहीं है कि पहले चीते नहीं आ सकते थे. 1970 के दशक में ईरान के शाह ने कहा था कि हम भारत को चीते देने के लिए तैयार हैं. लेकिन बदले में आपसे हमें शेर (Lion) चाहिए. लगभग उसी दौरान भारत की सरकार ने वाइल्डलाइफ (प्रोटेक्शन) एक्ट बनाया. जिसे 1972 में लागू किया गया. इसके अनुसार देश में किसी भी जगह किसी भी जंगली जीव का शिकार करना प्रतिबंधित है. जब तक इन्हें मारने की कोई वैज्ञानिक वजह न हो. या फिर वो इंसानों के लिए खतरा न बने.

इसके बाद देश में जंगली जीवों के लिए संरक्षित इलाके बनाए गए. लेकिन लोग चीतों को संभवतः भूल गए. असल में इसकी आवाज उठी साल 2009 में. जब वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया (WTI) ने राजस्थान के गजनेर में दो दिन का इंटरनेशनल वर्कशॉप रखा. सितंबर में हुए इस दो दिवसीय आयोजन में यह मांग की गई कि भारत में चीतों को वापस लाया जाए. दुनिया भर के एक्सपर्ट इस कार्यक्रम में थे. केंद्र सरकार के मंत्री और संबंधित विभाग के अधिकारी भी थे.

इन पांच राज्यों में चीतों के लायक वातावरण
कहा गया कि चार राज्य हैं, जहां पर चीतों को रखा जा सकता है. ये हैं- उत्तर प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश. एक्सपर्ट्स को लगता था कि इन पांचों राज्यों में से किसी भी जगह पर चीतों को रखा जा सकता है. उनके हिसाब से यहां वातावरण ठीक है. लेकिन फिर तय किया गया कि नहीं हम कुछ सर्वे और बारीक जांच करते है. ईरान से चीतों को मंगाने का ख्याल होल्ड पर रखा गया. वजह ये थी कि ईरान के चीतों का जेनेटिक्स अफ्रीकन चीतों से मिलता जुलता है. लेकिन फैसला गया अफ्रीकन चीतों को लाने के पक्ष में.

पांच राज्यों के 10 जगहों को तय किया गया. ये सात अलग-अलग तरह के लैंडस्केप पर मौजूद हैं. छत्तीसगढ़ में गुरु घासीदास नेशनल पार्क. गुजरात में बन्नी ग्रासलैंड्स. मध्यप्रदेश में डुबरी वाइल्डलाइफ सेंचुरी, संजय नेशनल पार्क, बागडारा वाइल्डलाइफ सेंचुरी, नॉराडेही वाइल्डलाइफ सेंचुरी और कूनो नेशनल पार्क. राजस्थान में डेजर्ट नेशनल पार्क वाइल्डलाइफ सेंचुरी और शाहगढ़ ग्रासलैंड्स और उत्तर प्रदेश की कैमूर वाइल्डलाइफ सेंचुरी.

क्यों चुना गया कूनो नेशनल पार्क?
मोंगाबे नाम की अंतरराष्ट्रीय वाइल्डलाइफ मैगजीन के जर्नलिस्ट मनीष चंद्र मिश्र ने बताया कि चीतों के विलुप्त होने के बाद भारतीय ग्रासलैंड की इकोलॉजी खराब हुई थी. उसे ठीक करना था. चीता अंब्रेला प्रजाति का जीव है. यानी फूड चेन में सबसे ऊपर मौजूद जीव. अगर यह नहीं आता तो फूड चेन का संतुलन पूरी तरह से बिगड़ जाता. कूनो नेशनल पार्क चुना इसलिए गया क्योंकि वहां पर चीतों के खाने की कमी नहीं है. यानी पर्याप्त मात्रा में शिकार करने लायक जीव हैं. चीतल जैसे जीव काफी मात्रा में मौजूद हैं. जिन्हें चीते पसंद से खाते हैं. साथ ही इस इलाके में पर्यटन बढ़ेगा. लोग चीतों को देखने आएंगे. राज्य को भी फायदा होगा.

ऐसा नहीं है कि सिर्फ वही दस साइट्स चुने गए थे. उनके अलावा IUCN के नियमों के तहत अगर किसी जीव को कहीं फिर से लाया जाता है तब और जगहों की भी जांच की जाती है. इसलिए पांच और स्थानों की जांच की गई थी. यानी राजस्थान के मुकुंदारा हिल्स टाइगर रिजर्व, शेरगढ़ वाइल्डलाइफ सेंचुरी और भैंसरोरगढ़ वाइल्डलाइफ सेंचुरी, मध्यप्रदेश की गांधी सागर वाइल्डलाइफ सेंचुरी और माधव नेशनल पार्क. कूनो नेशनल पार्क को दोबारा जांचा गया.

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