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नाइंसाफी का बुलडोजर… महाराष्ट्र से लेकर यूपी तक न्याय की ये कैसी कोशिश

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नई दिल्ली

बुलडोजर एक्शन पर सुप्रीम कोर्ट को एक बार फिर तल्ख टिप्पणी करनी पड़ी है। हैरत की बात है कि देश की शीर्ष अदालत के बार-बार कहने के बावजूद, महाराष्ट्र से लेकर यूपी तक बुलडोजर के जरिये कथित इंसाफ की कोशिश जारी है, जबकि कानून इसकी इजाजत नहीं देता।

सुनवाई का मौका नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने जिस घटना पर कहा कि यह उसकी अंतरात्मा को झकझोर देने वाली है, वह प्रयागराज की है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि नोटिस देने के 24 घंटे के भीतर उनके मकान गिरा दिए गए। इसी तरह, महाराष्ट्र के मालवण में एक कबाड़ व्यापारी के घर पर ++ बुलडोजर चलाने के मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने स्थानीय नगर परिषद को नोटिस जारी किया है। लेकिन सबसे ज्यादा चौकाती है नागपुर की घटना, जहां हाल में घटी हिंसा के आरोपियों के घर नगर निगम ने ध्वस्त करा दिए।

अधिकारों का उल्लंघन
हर जगह पुलिस-प्रशासन के काम करने का तरीका एक जैसा दिखता है। जिस भी मामले से बड़े जनसमुदाय की भावनाएं जुड़ी होती हैं, उनमें फटाफट आरोपियों की संपत्ति की नाप-जोख शुरू हो जाती है। एक दिन नोटिस जारी होता है और अगले दिन बुलडोजर पहुंच जाता है अपील करने तक का मौका नहीं दिया जाता, जो हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार है। नागपुर मामले में ही बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच ने आरोपियों की प्रॉपर्टी के खिलाफ कार्रवाई पर रोक लगा दी, लेकिन जब तक आदेश आता, तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

संदेह की वजह
प्रशासन का तर्क है कि निर्माण अवैध था। लेकिन, क्या बिना उचित सुनवाई के कार्रवाई करना वैध है? जो अवैध निर्माण बरसों से खड़ा है, जिस पर किसी अथॉरिटी की नजर नहीं जाती, अचानक वह इतना खतरनाक हो जाता है कि आनन-फानन में बुलडोजर चलाना पड़ता है। ऐसी ही तेजी सारे अवैध निर्माणों के खिलाफ क्यों नहीं दिखती? और इससे भी बड़ा सवाल है कि इतना बड़ा अवैध निर्माण हो कैसे जाता है?

आदेश की अवहेलना
सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2024 में कहा था कि दंडात्मक उपायों के रूप में बुलडोजर कार्रवाई असंवैधानिक है एक्शन से पहले नोटिस और सुनवाई का वक्त देना होगा सुप्रीम कोर्ट ने आदेश का उल्लंघन करने वाले अफसरों पर कार्रवाई तक की चेतावनी दी थी, लेकिन इसका असर होता नहीं दिख रहा और होगा भी क्यों, जब सरकारें खुद इसे प्रमोट करेंगी। इस पर रोक लगनी चाहिए।

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