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ऊपर से चमाचम पर भीतर से खोखला, जिस सेफ्टी का ढिंढोरा पीटा जाता रहा, वह कहा हैं रेल मंत्रीजी?

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नई दिल्ली

यह भी अजीब संयोग है। दिल्ली में रेल मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी एक फाइव स्टार होटल में दो दिवसीय चिंतन शिविर में भाग ले रहे हैं। उसमें एक प्रजेंटेशन पेश किया जा रहा है। इसमें बताया जा रहा है कि 26 हजार करोड़ रुपये खर्च किए जाएं तो रेलवे एक्सीडेंट फ्री हो जाएगा। इधर प्रजेंटेंशन पूरा हुआ, उधर ओडिशा से भयंकर रेल दुर्घटना की खबर आ गई। इस दुर्घटना का कारण क्या है, इसका खुलासा तो हाई लेवल कमेटी की जांच रिपोर्ट से पता चलेगा। लेकिन रेलवे महकमे से जो छन-छन कर रिपोर्ट आ रही है, उससे पता चलता है कि इस दुर्घटना का ठीकरा सिगनल सिस्टम पर फोड़ने की तैयारी है।

क्या हुआ एसीडी या रक्षा कवच का?
जिन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार की खबरों पर ध्यान दिया होगा, उन्हें पता होगा उसी दौरान बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री रेल मंत्री की भूमिका में थे। उन्होंने बड़े जोर-शोर से रक्षा कवच इंस्टालेशन की घोषणा की थी। रेलवे का दावा था कि रक्षा कवच एक Anti collusion device (ACD) है। इसे लगा देने के बाद एक्सीडेंट जीरो हो जाएगा। इसे सबसे पहले पूर्वोत्तर सीमा रेल में लगाया गया था। फिर देश के अन्य हिस्सों में लगाने की बात की गई थी। इस पर हजारों करोड़ रुपये फूंके गए।

मोदी सरकार में खूब इंप्रूवमेंट
जब केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनी तो सुरेश प्रभु रेल मंत्री बने। उन्होंने आते ही कहा था, सेफ‌्टी पर सबसे ज्यादा जोर रहेगा। उनके बाद पीयूष गोयल रेल मंत्री बने। फिर अश्विनी वैष्णव आए। सबों ने एसीडी, सिगनल इंप्रूवमेंट और ट्रैक इंप्रूवमेंट पर अच्छी खासी रकम खर्च की। पीयूष गोयल के जमाने में अश्विनी लोहानी बने थे रेलवे बोर्ड के चेयरमैन। उन्होंने तो पूरे देश के ट्रैक बदलवाने का बीड़ा उठाया था। खूब खर्च हुआ इसमें।

वैष्णव लाए कवच
4 मार्च 2022 को रेल मंत्री अश्वनी वैष्णव ने एक ट्वीट किया था। इसमें लिखा था नेशनल सेफ‌्टी डे पर ऑटोमेटिक ट्रेन प्रोटेक्शन टेक्नोलोजी की लाइव टेस्टिंग कर रहा हूं। इस ट्वीट में उन्होंने अपना एक फोटो भी लगाया था। वह एक इंजन की कैब में सवार दिख रहे हैं। इसके बाद मीडिया में खूब छपा था कि एक्सीडेंट तो अब असंभव है। एक ही पटरी पर दो ट्रेन होंगे तो ट्रेन अपने आप रूक जाएंगे।

पैसा जा कहां रहा है?
रेलवे के एक पूर्व अधिकारी ने हमसे बातचीत में एक सवाल किया। वह पूछते हैं कि जब हजारों करोड़ रुपये सेफ्टी के लिए खर्च हो रहा है तो एक्सीडेंट क्यों हुआ? पैसे जा कहां रहे हैं? हावड़ा-चेन्नई रेल मार्ग देश का ट्रंक रूट है। वहां पहले से ही ट्रैक और सिगनलिंग आदि सिस्टम बेहतर है। तब ऐसी दुर्घटना क्यों हुई?

ऊपर से फिट-फाट, अंदर से मोकामा घाट?
रेलवे के ही एक अन्य रिटायर्ड अधिकारी का कहना है कि इन दिनों सेफ्टी से समझौता किया जा रहा है। अधिकारियों में दम बचा नहीं है। रेल मंत्री भरी सभा में बे-इज्जत न कर दे, इस डर से वे सही बात बताते नहीं हैं। ठकुरसुहाती वाली बातें जब हाई लेवल मीटिंग में होगी तो फिर सब कुछ चाक-चौबंद ही दिखेगा। खामी तो तब दिखेगी जबकि कोई हादसा होगा। उनके मुताबिक, इन दिनों अधिकारियों का ध्यान स्टेशन की बिल्डिंग चमकाने पर ज्यादा है। रेलवे का सिस्टम दुरूस्त करने पर कम। वह कहते हैं कि रेलवे की हालत एक कहावत

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