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सिंधु घाटी सभ्यता को निगल गया जलवायु परिवर्तन, नई रिपोर्ट से तो चेत जाए दुनिया

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नई दिल्ली/पुणे

दुनिया जलवायु परिवर्तन के संभावित खतरों पर बात तो कर रही है, लेकिन इससे निपटने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठा रही है। जबकि एक नई रिसर्च रिपोर्ट कहती है कि जलवायु परिवर्तन ने ही सिंधु घाटी जैसी महान सभ्यता का विनाश कर दिया। सिंधु घाटी सभ्यता के पतन पर एक और शोध में यह महत्वपूर्ण जानकारी सामने आई है। भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (IITM) के शोधकर्ताओं ने पाया है कि 4,000 साल से भी पहले सिंधु घाटी सभ्यता का पतन जलवायु में उतार-चढ़ाव की वजह से हुआ था। जलवायु कारकों की वजह से आज भी मानसून प्रभावित होता है।

क्वाटरनेरी इंटरनैशनल में प्रकाशित यह रिसर्च रिपोर्ट में दक्षिण भारत के गुप्तेश्वर और कडप्पा गुफाओं में पाए गए प्राचीन गुफा संरचनाओं (स्पेलियोथेम्स) से साक्ष्य पेश किए गए हैं। इन गुफाओं से मिले साक्ष्य बताते हैं कि लंबे समय तक सूखे की एक श्रृंखला चलते रहने के कारण सिंधु घाटी सभ्यता में मानसून प्रणाली कमजोर हो गई जिस कारण सूखे के हालात बने रहे।

7 हजार साल का क्लाइमेट रिकॉर्ड
शोध दल ने प्रायद्वीपीय भारत में गुफा की जांच की। इसमें 7,000 साल का क्लाइमेट रिकॉर्ड सामने आया। इससे क्षेत्र के पिछले जलवायु परिवर्तनों के बारे में विस्तृत जानकारी मिली। उनके निष्कर्षों से पता चला कि लगभग 4,200 साल पहले कम सौर विकिरण, बढ़ी हुई अल नीनो घटनाएं, इंटरट्रॉपिकल कन्वर्जेंस जोन (ITCZ) का दक्षिण की ओर पलायन, और हिंद महासागर डिपोल (IOD) का एक नकारात्मक चरण मिलजुलकर मानसून पैटर्न को कमजोर कर रहे थे।
मानसून के कमजोर होने से संभवतः सिंधु घाटी सभ्यता का पतन हुआ, जिसमें हड़प्पा और मोहनजोदारो जैसे प्रमुख शहरी केंद्र के साथ-साथ धोलावीरा, लोथल और राखीगढ़ी जैसी बस्तियां शामिल थीं।

आईआईटीएम के प्रमुख शोधकर्ता नवीन गांधी ने कहा, ‘दिलचस्प बात यह है कि आज हम मानसून को प्रभावित करने वाले क्लाइमेट पैटर्न देखते हैं, वे हजारों साल पहले भी मौजूद थे, जिन्होंने पूरी सभ्यताओं के भाग्य को आकार दिया था। अक्सर ‘रेन बेल्ट’ के रूप में जाना जाने वाला आईटीसीजेड भारतीय उपमहाद्वीप में वर्षा को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

इस कारण सिंधु के इलाके में नहीं हो पाई जोरदार बारिश
लगभग 4,200 साल पहले आईटीसीजेड दक्षिण की ओर खिसक गया जिससे सिंधु क्षेत्र में पर्याप्त वर्षा नहीं हो पाई। साथ ही, हिंद महासागर में समुद्र की सतह के तापमान को प्रभावित करने वाला क्लाइमेट पैटर्न आईओडी के एक नकारात्मक असर ने पूर्वी हिंद महासागर को ठंडा कर दिया, जिससे उपमहाद्वीप में नमी का संचार और कम हो गया। इस अवधि में सौर विकिरण में कमी और अल नीनो घटनाओं में वृद्धि भी हुई, जिससे सूखे की स्थिति और भयंकर हो गई, जिसने सिंधु घाटी को लंबे समय तक परेशान किया।

अध्ययन इस बात पर प्रकाश डालता है कि प्राचीन जलवायु प्रणालियों ने मानव बस्तियों और सभ्यता को किस तरह से महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित किया। यह शोध न केवल सिंधु घाटी के सामने आने वाली पर्यावरणीय चुनौतियों के बारे में हमारी समझ को गहरा करता है, बल्कि मानव समाज पर जलवायु परिवर्तनशीलता के स्थायी प्रभाव पर भी जोर देता है।

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