बांदा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को केन-बेतवा लिंक परियोजना का शुभारंभ किया। इस अवसर पर जहां सरकार ने इसे बुंदेलखंड के लिए विकास की नई पहल बताया, वहीं दूसरी ओर परियोजना के डूब क्षेत्र में आने वाले पन्ना टाइगर रिजर्व और इसके आस-पास के 22 गांवों के ग्रामीणों ने विरोध प्रदर्शन किया। बिजावर के सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर के नेतृत्व में सैकड़ों ग्रामीण दौढ़न बांध निर्माण स्थल पर एकत्र हुए। उन्होंने प्रतीकात्मक चिता बनाकर आग लगाई और जलती चिताओं पर लेटकर अपना गुस्सा जाहिर किया।
प्रदर्शन कर रहे ग्रामीणों का कहना है कि यह परियोजना उनकी जमीन, माटी और सांस्कृतिक पहचान को नष्ट कर रही है। उन्होंने बताया कि उनकी पीढ़ियों से चली आ रही खेतिहर जमीन और घरों को जबरन अधिग्रहित कर लिया गया है। मुआवजे के वितरण में भी राजस्वकर्मियों द्वारा भ्रष्टाचार के आरोप लगाए गए हैं। ग्रामीणों ने फर्जी ग्राम सभाओं और सरकारी लाठीचार्ज का जिक्र करते हुए कहा कि उनके साथ अन्याय किया गया है।
विकास नहीं, यह विनाश का प्रतीक है
सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर ने इस परियोजना को पर्यावरण और जैव विविधता के लिए घातक बताया। उन्होंने कहा कि यह परियोजना न केवल पन्ना टाइगर रिजर्व के कोर क्षेत्र को नष्ट करेगी, बल्कि डूब क्षेत्र के 22 गांवों के आदिवासियों और किसानों को उनकी पहचान और अधिकारों से भी वंचित कर देगी। अमित भटनागर ने केंद्रीय सशक्त समिति (CEC) की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि परियोजना के पर्यावरणीय दुष्प्रभावों की पूरी तरह अनदेखी की गई है। उन्होंने सवाल किया कि जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) में विचाराधीन है, तो इतनी जल्दबाजी क्यों की जा रही है।
विस्थापन की समस्याओं का आरोप
प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि ‘पंचायती राज अधिनियम’ और ‘भूमि अधिग्रहण अधिनियम’ का पालन नहीं किया गया। फर्जी ग्राम सभाओं के माध्यम से सहमति के झूठे दावे किए गए। मुआवजे के वितरण में असमानता रही, और विस्थापित ग्रामीणों को रोजगार और पुनर्वास की सुविधाएं नहीं दी गईं।
परियोजना पर रोक और वैकल्पिक समाधान
ग्रामीणों ने प्रधानमंत्री से अपील की है कि सुप्रीम कोर्ट और NGT के अंतिम निर्णय तक परियोजना के कार्यों को रोका जाए। उन्होंने पारंपरिक जल स्रोतों और चंदेल कालीन तालाबों को पुनर्जीवित कर जल संकट का समाधान खोजने की मांग की है।
जल संकट की चेतावनी
प्रदर्शनकारियों ने बताया कि परियोजना के तहत 46 लाख पेड़ों की कटाई की जाएगी, जिससे पर्यावरण को भारी नुकसान होगा। उन्होंने कहा कि बुंदेलखंड पहले से जल संकट से जूझ रहा है और यह परियोजना इस संकट को और बढ़ा सकती है।
