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दिल्ली को भारी पड़ेगी दो नावों की सवारी… पाक एक्सपर्ट ने भारत को चेताया, बोलीं-हमारी तरह हो सकता है धोखा

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इस्लामाबाद

भारत ने ईरान और रूस से अपने संबंध बनाए रखे हैं तो इन देशों के प्रतिद्वन्द्वी अमेरिका से भी रिश्ते रखे हुए हैं लेकिन आने वाले समय में ये संतुलन मुश्किल हो जाएगा। विदेश मामलों की जानकार शाजिया अनवर चीमा का ऐसा मानना है। शाजिया ने पाक अखबार एक्सप्रेस ट्रिब्यून में लिखे अपने लेख में भारत की विदेश नीति पर बात की है। शाजिया का कहना है कि भारत ने रूस और ईरान जैसे देशों से तेल खरीदकर अमेरिका और यूरोपीय देशों के प्रतिबंधों को अनदेखा किया है। यह स्थिति पश्चिमी देशों को असहज करती है, जो भारत को एशिया-प्रशांत क्षेत्र में महत्वपूर्ण सहयोगी मानते हैं। ऐसे में सवाल है कि क्या भारत दो विरोधी वैश्विक शक्तियों के साथ संबंधों का संतुलन बनाए रख सकता है। वहीं शाजिया ने पाकिस्तान के पश्चिमी देशों और चीन के साथ संबंधों और अफगानिस्तान से तनातनी पर भी बात की है।

प्राग की चार्ल्स यूनिवर्सिटी में सेमीओटिक्स और कम्युनिकेशन फिलॉसफी की पीएचडी स्कॉलर शाजिया अनवर कहती हैं, ‘यूक्रेन युद्ध की शुरुआत के बाद से पश्चिमी देश भारत पर रूस और ईरान से कच्चा तेल ना खरीदने का दबाव डाल रहे हैं। भारत ने इसे लगातार अनसुना कर दिया है। भारत ने इस बात का फायदा उठाया है कि उसे एशिया-प्रशांत क्षेत्र में पश्चिम एक सुरक्षा प्रदाता मानता है। भारत ना केवल रूस से बल्कि ईरान से भी तेल खरीद रहा है, जो पश्चिमी देशों का विरोधी है। अमेरिका और पश्चिमी देशों ने भारत को एक संभावित सहयोगी के रूप में देखते हैं और उसे संदेह का लाभ देते हैं। हालांकि पश्चिमी मीडिया अब इस बात पर सवाल उठा रहा है कि क्या भारत एक विश्वसनीय साथी है।

क्या चल पाएगी भारत की ये नीति?
शाजिया कहती हैं, ‘भारत अपनी इस नीति को अपनी विदेश नीति की सफलता मानता है। वह एक साथ कई नावों पर सवार होने की रणनीति अपना रहा है लेकिन सवाल यह है कि क्या आज के ध्रुवीकृत भूराजनीतिक परिदृश्य में ऐसा चल पाएगा। क्या कोई पश्चिमी प्रतिबंधों का उल्लंघन करते हुए भी पश्चिम का विश्वसनीय भागीदार बना रह सकता है। मुझे लगता है कि ऐसा कोई रास्ता नहीं बचा है। भारत को आखिरकार एक पक्ष चुनना होगा। भारत के विदेश मंत्री जयशंकर भले ही तटस्थता की बात करें लेकिन जमीनी हकीकत अलग है।

शाजिया कहती हैं, ‘पाकिस्तान ने हमेशा आवश्यकता के आधार पर पश्चिम का साथ दिया है, लेकिन खुद को चीन का करीबी दोस्त भी बताया है। इसका नतीजा ये हुआ कि पश्चिम ने अशरफ गनी, तालिबान और अमेरिका के बीच एक गुप्त समझौते के साथ पाकिस्तान को धोखा दिया। तालिबान के काबुल पर कब्जा करने के बाद भी अमेरिका ने पाकिस्तान पर ईरान और चीन के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए दबाव बनाने के लिए तालिबान को गुप्त रूप से धन देना जारी रखा है। ऐसा कुछ भारत के साथ भी हो सकता है।

‘चीन विरोध का फायदा भारत को?’
शाजिया के मुताबिक, पाकिस्तान ने हमेशा ऐसे किसी भी भूराजनीतिक व्यवस्था का खुले तौर पर विरोध किया है, जो चीन के लिए हानिकारक हो। उसकी चीन को रोकने में कोई भूमिका निभाने की इच्छा नहीं है, जबकि भारत पश्चिम को यह विचार बेचता है कि वह एशिया-प्रशांत में चीन को नियंत्रित करने और पश्चिमी हितों की रक्षा करने में रणनीतिक साझेदार है। हालांकि भारत पारस्परिक दायित्व के ढांचे के भीतर काम नहीं करता है। भारतीय मूल के अमेरिकी विद्वान एश्ले टेलिस का मानना है कि भारत कभी भी चीन के साथ अमेरिका के किसी भी टकराव में शामिल नहीं होगा।

शाजिया कहती हैं कि 1980 के दशक के अंत तक भारत गुटनिरपेक्ष नीति का पालन करते हुए पूर्व सोवियत संघ के सबसे करीबी सहयोगियों में से एक था जबकि पाकिस्तान ने उसे तोड़ने में पश्चिम की मदद की थी। उस समय चीन के सोवियत नेतृत्व के साथ खराब संबंध थे। पिछले 40 वर्षों में इस स्थिति में कई बदलाव आए हैं। उपमहाद्वीप के इतिहास में रूस-भारत और पाकिस्तान-चीन के बीच गहरे संबंध रहे हैं। चीन और रूस के बीच संबंधों में सुधार ने काफी कुछ बदला है। इसे पश्चिम भी देख रहा है और भारत के लिए आने वाला समय मुश्किल का सबब हो सकता है।

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