चेन्नई
मद्रास हाई कोर्ट ने अदालतों से कहा है कि वे फैसला सुनाने के लिए क्राउडसोर्स्ड वेबसाइटों पर उपलब्ध सूचनाओं पर भरोसा न करें। यह कहते हुए हाई कोर्ट ने एनआईए अदालत के आदेश को रद्द कर दिया। मामला एक कट्टरपंथी संगठन के सोशल मीडिया अकाउंट से पोस्ट साझा करने के आरोपी का था। व्यक्ति की याचिका को खारिज करने के लिए विकिपीडिया से एक प्रतिबंधित संगठन का विवरण निकाला गया था।
जियावुद्दीन बाकवी पर यूएपीए के तहत राजद्रोह और अन्य अपराधों का आरोप लगाया गया था। आरोपों को चुनौती देते हुए, उन्होंने विशेष अदालत का रुख किया, लेकिन उनकी याचिका खारिज कर दी गई। एनआईए अदालत ने कथित संगठन को लेकर विकिपीडिया में साझा की गई सामग्री पर भरोसा किया।
देशद्रोह का हुआ था केस
जियावुद्दीन पर कट्टरपंथी संगठन के फेसबुक पेज से पोस्ट करने और उसे शेयर करने का आरोप लगा था। उसके ऊपर गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनिय की धारा 13 (1) बी के तहत केस दर्ज किया गया था।
चेन्नई हाई कोर्ट में गया था मामला
जियावुद्दीन बाकवी ने चेन्नई हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। न्यायमूर्ति एम सुंदर और न्यायमूर्ति एम निर्मल कुमार की उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने विशेष अदालत के निष्कर्ष को अस्वीकार कर दिया।
हाई कोर्ट ने वापस भेजा केस
हाई कोर्ट ने कहा, ‘विशेष अदालत ने स्पष्ट रूप से इकाई के विवरण के लिए विकिपीडिया पर भरोसा किया। याचिकाकर्ता के उद्धृत केस कानूनों के संबंध में विशेष अदालत का आदेश मौन था और केस कानूनों पर किसी भी चर्चा के बिना केवल इसे खारिज कर दिया था। ट्रायल कोर्ट को इस पर कुछ चर्चा करनी चाहिए कि मौजूदा मामले में केस कानून कैसे लागू नहीं होते।’ हाई कोर्ट ने कहा कि इस बिंदु पर भी मामले को निचली अदालत में वापस जाना होगा।
