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रोजाना 500 मामलों की सुनवाई हो तब भी लग जाएंगे 3 हजार दिन… दिल्ली की अदालतों का यह सच भी जान लीजिए

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नई दिल्ली

राजधानी दिल्ली की अदालतों में फाइलों का अंबार लगा हुआ है। कोर्ट के कर्मचारी काम के बोझ से तंग आ चुके हैं। खास तौर पर चेक बाउंस (NI एक्ट) के मामले इतने ज्यादा हैं कि स्थिति बेकाबू हो गई है। कोर्ट में जगह की भारी कमी है। कर्मचारियों को बैठने की जगह तक नहीं मिल रही। इस वजह से काम में देरी हो रही है। दिल्ली की अदालतों में करीब 15 लाख मामले अभी तक लंबित हैं। कर्मचारी चाहते हैं कि उनकी परेशानी दूर हो।

कोर्ट रूम में फाइलों का ढेर
दिल्ली के एक कोर्ट में काम करने वाले रिकॉर्ड कीपर ने अपना दर्द बताया। उसने बताया कि पूरा कोर्ट रूम फाइलों से भरा पड़ा है। कुछ फाइलें लोहे की अलमारियों में रखी हैं, कुछ को कपड़े में बांधकर टिका दिया गया है, और कुछ तो जमीन पर ही पड़ी हैं। ऐसी स्थिति में काम करना बेहद मुश्किल हो जाता है। परेशान होकर वह कहता है, “अगर कैदियों को सजा देनी है, तो उनसे हमारा काम करवाइए। असली सजा तो हम भुगत रहे हैं। वो तो बस जेल चले जाते हैं।”

काम का बोझ, परिवार को वक्त नहीं
रिकॉर्ड कीपर ने कहा, “हम तो संडे वाले पापा बन कर रहे गए हैं।” यानी वह अपने परिवार को बिल्कुल समय नहीं दे पाता। सिर्फ रविवार को ही अपने बच्चों से मिल पाता है। यह एक डिजिटल कोर्ट रूम है, जहां चेक बाउंस के मामले देखे जाते हैं। रीडर का काम है कि कोई फाइल गायब न हो और कोर्ट का काम सही से चले।

तीन कोर्ट में 7,000 मामले लंबित
इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली के तीन कोर्ट परिसरों के कर्मचारियों ने बताया कि सबसे बड़ी समस्या लंबित मामलों की है। इन कोर्ट में औसतन 7,000 मामले पेंडिंग हैं। हर दिन 80 से 120 मामलों की सुनवाई होती है। दिल्ली में कुल 12 कोर्ट परिसर हैं, जहां 671 जज काम करते हैं। इनमें करीब 15 लाख मामले लंबित हैं। इसमें 2.16 लाख सिविल और 12.73 लाख क्रिमिनल केस शामिल हैं। हर कोर्ट में औसतन 2,200 मामले पेंडिंग हैं।

चेक बाउंस कोर्ट में हालात बदतर
चेक बाउंस (NI एक्ट) के कोर्ट में हालात और खराब हैं। यहां 13,000 मामले लंबित हैं, जो औसत से छह गुना ज्यादा है। नियम के मुताबिक, इन मामलों को छह महीने में निपटाना चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा। इन कोर्ट में हर दिन 50 से 100 मामले सुने जाते हैं। पटियाला हाउस कोर्ट में NI एक्ट के पांच फिजिकल और तीन डिजिटल कोर्ट रूम हैं। एक कर्मचारी कहता है, “केस खत्म ही नहीं होते। हम 50 निपटाते हैं, तो 100 नए आ जाते हैं। इसलिए अगली तारीख देनी पड़ती है।”

जगह की कमी से बंद कमरे
ज्यादातर रिकॉर्ड्स के कमरे बंद पड़े हैं। ऐसा इसलिए नहीं कि ताले लगे हैं, बल्कि दरवाजों के बाहर अलमारियां रखी हैं। इनमें फाइलें भरी हुई हैं, जिससे अंदर जाने का रास्ता ही नहीं बचता। कुछ कोर्ट रूम में जगह की कमी नहीं है, वहां फाइलें ठीक से रखी हैं। लेकिन ज्यादातर जगहों पर फाइलें एक-दूसरे के ऊपर ढेर हैं। एक रिकॉर्ड कीपर कहता है, “जब कोई अफसर आता है और ये हाल देखता है, तो हमें डांट पड़ती है। अब आप बताइए, हम क्या करें?”

12 घंटे काम, परेशानी बरकरार
अधिकतर रिकॉर्ड कीपर सुबह 8 से रात 8 बजे तक, यानी 12 घंटे काम करते हैं। एक रिकॉर्ड कीपर कहता है, “यहां कोई भी ऐसा नहीं है जो परेशान न हो। बैठने या काम करने की जगह नहीं है। कभी-कभी पूरा दिन खड़े होकर फाइलें देखनी पड़ती हैं। अगर कोई कागज गायब हो जाए, तो हम पर जांच बैठेगी।” जगह इतनी कम है कि लोग बारी-बारी से कमरे में आते-जाते हैं। दो कुर्सियां और एक टेबल रखने की भी जगह नहीं है। एक कर्मचारी मजाक में कहता है, “जिनका पेट बड़ा है, उनके लिए तो अंदर घुसना भी मुश्किल है। मैं तो एक बार फंस ही गया था।”

कर्मचारियों की मांग, कोई सुनवाई नहीं
कर्मचारियों ने जज से अलमारियों की मांग की थी। जज ने मंजूरी भी दे दी, लेकिन केयरटेकिंग ब्रांच ने कहा कि उनके पास अलमारियां नहीं हैं। एक रीडर कहता है, “हमारी सुनता कौन है? हम न जज हैं, न बड़े वकील। काम के बोझ से 350 कर्मचारियों ने समय से पहले रिटायरमेंट ले लिया।”

फिजिकल कोर्ट में भी हाल बेहाल
इंडियन एक्सप्रेस ने एक फिजिकल NI एक्ट कोर्ट का दौरा किया। यहां अलग से रिकॉर्ड कीपर कमरा नहीं है। कोर्ट रूम को दो हिस्सों में बांटा गया है। एक तरफ जज और वकील बैठते हैं, दूसरी तरफ कर्मचारी फाइलें संभालते हैं। यहां भी 7,000 से ज्यादा मामले पेंडिंग हैं। एक कर्मचारी कहता है, “मैंने हाल ही में जॉइन किया है। इन फाइलों को देखिए। क्या यहां बैठने की जगह है? हम 11-12 घंटे काम करते हैं। अगर कोई वकील जिद करे कि अभी फाइल चाहिए, तो आधा-एक घंटा लग जाता है ढूंढने में।”

वकील ने बताई देरी की वजह
वकील प्रवेश डबास के पास 200 से ज्यादा चेक बाउंस केस हैं। उनका कहना है कि सिर्फ मामलों की संख्या ही देरी की वजह नहीं है। समन भेजने में देरी, क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र जैसे मुद्दे भी हैं। वे कहते हैं, “एक केस में दूसरी पार्टी छह साल से कोर्ट नहीं आई। दूसरे राज्य में रहने वाले को समन भेजना मुश्किल है। इससे भी देरी होती है।”

स्टेनोग्राफर की कमी
काम का बोझ सिर्फ रिकॉर्ड कीपर पर नहीं, जजों पर भी है। हाल ही में कई जजों ने स्टेनोग्राफर की कमी को लेकर सर्कुलर जारी किए। 2024 में राउज एवेन्यू कोर्ट की जज अंजू बजाज चंदना ने कहा था कि स्टेनोग्राफर बहुत कम हैं। पिछले साल भी ऐसा ही सर्कुलर जारी हुआ था। कर्मचारी चाहते हैं कि उनकी परेशानी सुनी जाए और इसका हल निकले।

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