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पल भर पहले मौज, और फिर मौत… जिंदगी का क्या भरोसा, इन 4 सेकंड ने बहुत कुछ सिखा दिया

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‘मुकद्दर का सिकंदर’ फिल्म का मोहम्मद रफी का गाया ये गीत आपने जरूर सुना होगा। दर्द भरे गीतों के एलबम में ये गीत अक्सर सुना जाता है। नेपाल प्लेन क्रैश से कुछ सेकेंड पहले का वायरल वीडियो देख यह गीत कानों में गूंज रहा है। लोग सच ही कहते हैं मौत का कोई भरोसा नहीं। कब क्या हो जाएगा, कोई कुछ नहीं कह सकता। तभी तो संत कहते हैं कि आज जो पल मिला है उसे पूरे उत्साह के साथ जी लीजिए, कल की चिंता छोड़ दीजिए। गाजीपुर के चार दोस्तों ने नेपाल के प्लेन मैं बैठते समय एक पल के लिए भी नहीं सोचा होगा कि यह उनका अंतिम सफर साबित होगा। क्रैश से ठीक पहले वे खुशी-खुशी प्लेन के सफर को इंजॉय कर रहे थे। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में दिखाई देता है कि वे फेसबुक लाइव कर रहे थे। चेहरे पर मुस्कान थी तभी एक दोस्त कहता है, ‘वाह बेटा वाह, मौज कर दी’। उस समय कैमरा खिड़की की तरफ था और जमीन का इलाका दिखाई दे रहा था। वे लगातार बात कर रहे थे। काफी खुश थे, कैमरा ऑन था और तभी प्लेन हिलने लगा, चिल्लाने की आवाज आने लगी और 4 सेकेंड में आग की लपटें लाइव थीं। पूरा प्लेन आग की लपटों में जल रहा था। ये 4 सेकेंड जीवन की सच्चाई को बयां करते हैं।

अगले 30 सेकेंड तक वीडियो चलता रहता है और कैमरे के सामने सिर्फ आग की लपटें दिखाई देती हैं। रविवार को नेपाल के पोखरा में हुए विमान हादसे में 68 लोगों की मौत हो गई। इसमें चार दोस्त यूपी के गाजीपुर के रहने वाले थे। सोनू जायसवाल (29), अनिल राजभर (28), विशाल शर्मा (23), अभिषेक सिंह कुशवाहा (23) दो दिन पहले 13 जनवरी को काठमांडू पहुंचे थे और पशुपतिनाथ मंदिर में पूजा करने के बाद वे पैराग्लाइडिंग के लिए पोखरा जा रहे थे।

जिस समय प्लेन में चीख-पुकार मचती है, मोबाइल नीचे गिर जाता है। चारों दोस्त प्लेन से यात्रा करने के लिए काफी उत्सुक थे। बताते हैं तीन दोस्त पहली बार प्लेन में बैठे थे। सोनू जायसवाल ने प्लेन में बैठने से ठीक पहले अपनी तस्वीर सोशल मीडिया पर डाली थी। यह प्लेन पोखरा एयरपोर्ट पर लैंड करने से ठीक 10 सेकेंड पहले ही क्रैश हो गया। 6 महीने पहले सोनू को बेटा हुआ था। उसने भगवान पशुपतिनाथ का दर्शन करने की मन्नत मांगी थी लेकिन….। उसकी दो बेटियां आराध्या (6) और अनामिका (3) हैं। इस हादसे ने इन तीन बच्चों से उनके पिता को छीन लिया है।

कुछ लोग ऐसी घटनाओं पर कहते हैं कि ऊपर वाले की मर्जी के आगे किसकी चलती है। कुछ लोग परिवार को यह कहकर सांत्वना देते हैं कि वह इतने ही दिन के लिए आया था। होनी को कौन टाल सकता है… लेकिन जरा उस परिवार, उन बच्चों के बारे में सोचिए जिन्हें समझ में ही नहीं आ रहा होगा कि क्या हुआ है। घर में भीड़ है, सबकी आंखों से आंसू निकल रहे हैं, बच्चों को घर में सब दिख रहे हैं लेकिन पापा नहीं हैं। रोजाना ऐसी घटनाएं और हादसे सामने आते हैं और लोगों में निराशा भर जाती है। क्या पता कल हो न हो?

किसी ने सच ही लिखा है,
‘जिंदगी का कोई भरोसा नहीं
जी लो हर पल मुस्कुराहटों के साथ’

पैसा खो जाए तो आप फिर से कमा सकते हैं। संपत्ति नष्ट हो जाए तो आप फिर से इकट्ठा कर सकते हैं लेकिन जन की हानि सबसे दुखद है और इसमें कोई कुछ भी नहीं कर सकता है।

बहनों के लिए गिफ्ट लेने निकली थी बच्ची लेकिन..
वह 18 साल की होने वाली थी। अंग्रेजी के साथ तकनीकी ज्ञान काफी अच्छा था। 2022 की आखिरी शाम यानी 31 दिसंबर की शाम 6 बजे वह घर से निकली थी। पापा से कहकर गई थी कि बताना नहीं, दोनों बहनों के लिए गिफ्ट लेने जा रही हूं। रात में सरप्राइज दूंगी। नए साल की वेलकम पार्टी के प्लान की जल्दी में वह अपना फोन ले जाना भी भूल गई। मुंबई के पास एक दिवा जंक्शन हैं। बताते हैं यहां आए दिन हादसे होते हैं। उस दिन वह बच्ची चपेट में आ गई। माता-पिता घर पर वेट करते रहे, देर होने लगी तो बाहर निकले। गली में चर्चा थी कि अभी एक लड़की का एक्सीडेंट हो गया। बेचारी… सुनकर माता-पिता की धड़कनें बढ़ गईं। अगले कुछ मिनटों बाद मां बेहोश पड़ी थी, पिता को समझ में नहीं आ रहा था कि वह अपनी बेटी का ये हाल देख आंसू बहाए या पत्नी और बाकी दो बेटियों को संभाले। जिस उम्र में लोग अपनी बेटियों के हाथ पीले करने के बारे में सोचते हैं, उस बदनसीब पिता को बेटी का क्रियाकर्म करना पड़ा। परिवार यूपी के प्रतापगढ़ से ताल्लुक रखता है।

ऐसी सच्ची घटनाएं पढ़कर या सुनकर दिल बैठ जाता है। आखिर भगवान ऐसे हादसे को रोक क्यों नहीं देता? कुछ लोग कहते हैं कि मौत के पीछे ‘कारण’ जुड़ जाता है। कभी लगता है कि यह धरती एक तरह का रंगमंच है यहां हम सभी एक किरदार हैं बस और सबके लिए परदा गिरने से पहले एक टाइम मिला हुआ है, उसी में आपको अपना रोल निभाना है। हां, असली रंगमंच से एक चीज अलग है, वो यह भी किरदार को भी पता नहीं होता है कि उसके लिए परदा कब गिर जाएगा। यहां कुछ भी स्क्रिप्टेड नहीं होता है।

जब शरीर थक जाता है, अंग शिथिल पड़ जाते हैं, बुढ़ापे में मौत को स्वाभाविक मौत कहा जाता है। लेकिन जब अचानक इस तरह के हादसों में नौजवान लोग या बच्चे हमसे हमेशा के लिए दूर चले जाते हैं तो असहनीय पीड़ा होती है। इस दर्द के साथ ही परिवार को जीना पड़ता है। ताउम्र परिजनों को लगता है कि काश, उस दिन उसे न जाने दिया होता लेकिन मौत को कौन रोक सका है। वैसे, गीता में कहा गया है कि मृत्यु केवल शरीर की होती है, आत्मा की नहीं।

आखिर में 1971 की ‘आनंद’ फिल्म में राजेश खन्ना की कही वो बात याद आ रही है-
‘बाबू मोशाय, जिंदगी बड़ी होनी चाहिए लंबी नहीं… जिंदगी और मौत ऊपर वाले के हाथ में है जहांपनाह, जिसे न आप बदल सकते हैं न मैं, हम सब तो रंगमंच की कठपुतलियां हैं, जिनकी डोर ऊपर वाले की उंगलियों में बंधी है। कब कौन कैसे उठेगा, यो तो कोई नहीं बता सकता।

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