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Tuesday, April 28, 2026
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रोज लग रहे दिल्ली चक्कर, फिर भी नहीं खुल रहा राज, शिवराज ‘मामा’ को किनारे कर फंस गई पार्टी!

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भोपाल

बीजेपी ने मध्य प्रदेश में 3 दिसंबर को प्रचंड बहुमत से सत्ता में वापसी की। इसके बावजूद अभी तक मंत्रिमंडल का गठन नहीं हो पाया है। सिर्फ मुख्यमंत्री और 2 डेप्युटी सीएम मिलकर काम कर रहे हैं। मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव, जबकि राजेंद्र शुक्ल और जगदीश देवड़ा को डेप्युटी सीएम बनाया गया है। तीनों ही दिल्ली जाकर पीएम मोदी समेत तमाम हाईकमान के साथ बैठक कर चुके हैं। सीएम मोहन यादव खबर लिखे जाने तक दिल्ली में ही थे।

देरी से क्या हैं नुकसान
2024 में लोकसभा का चुनाव होना है। दो से तीन महीने में इसका ऐलान हो जाएगा। इसके बाद तैयारियां चलेंगी। बड़े नेताओं की ताबड़तोड़ बैठक और रैलियां होंगी। ऐसे में काम करने के लिए मंत्रियों के पास सीमित समय है। अगर मंत्रिमंडल का गठन जल्दी नहीं होता है तो मंत्रियों को काम करने में समस्या आ सकती है और उनके काम मई-जून तक अटक सकते हैं।

इसके अलावा बीजेपी ने संकल्प पत्र में मध्य प्रदेश की जनता को जो वादे किए हैं, उन्हें पूरा करने का दबाब भी सरकार पर होगा। इसकी वजह ये है कि मध्य प्रदेश में लोकसभा की 29 सीटें हैं। पिछले चुनावों में बीजेपी ने शानदार प्रदर्शन किया था। इस बार भी बीजेपी ऐसा ही प्रदर्शन दोहराना चाहेगी। इसके लिए जनता के बीच जाकर योजनाएं और उनके फायदे बताने होंगे। इसलिए सरकार चाहेगी कि संकल्प पत्र के कुछ वादों को पूरा कर जनता के बीच जा सके।फरवरी में राज्य का बजट भी प्रस्तावित है। मध्य प्रदेश पहले से ही कर्जे से बुरी तरह घिरा हुआ है। अगर कैबिनेट का विस्तार जल्दी नहीं हुआ तो मंत्री अपने विभाग की समीक्षा भी नहीं कर पाएंगे।

कहां फंसा है पेंच?
3 दिसंबर को मध्य प्रदेश में चुनाव परिणाम घोषित हुए। इसमें सबको हैरान करते हुए बीजेपी ने 230 में से 162 सीटों पर जीत हासिल की। कई जिलों में बीजेपी ने शानदार प्रदर्शन किया। उदाहरण के लिए इंदौर की सभी 9 सीटों पर बीजेपी ने क्लीन स्वीप कर दिया। इसी जिले में बीजेपी की ओर से कई दिग्गज चुनाव लड़े। इनमें महासचिव कैलाश विजयवर्गीय से लेकर रमेश मेंदोला, मालिनी गौड़ और कांग्रेस के नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी को चुनाव हराने वाले मधु वर्मा और केंद्रीय मंत्री सिंधिया के खास तुलसीराम सिलावट भी शामिल हैं।

ऐसे में बीजेपी की सिरदर्दी बढ़ी हुई है कि किसे मंत्री बनाया जाए। ये तो जाहिर है कि मंत्रिमंडल का विस्तार पीएम मोदी-शाह की गुड बुक के हिसाब से होना है, लेकिन ये सिर्फ एक जिले का उदाहरण था। मध्य प्रदेश में जनता ने बीजेपी को भरपूर समर्थन दिया है। इंदौर के अलावा नरसिंहपुर, नर्मदापुरम, विदिशा, सीहोर और नीमच जैसे जिलों की सभी सीटों पर बीजेपी ने शानदार जीत हासिल की है। ऐसे में इन जिलों से मंत्री चुनना बीजेपी के लिए टेढ़ी खीर बना हुआ है।

कुछ जिले ऐसे भी हैं, जिनमें एकाध सीट छोड़कर ज्यादातर सीटें बीजेपी के खाते में गईं। बीजेपी का खास ध्यान उन सीटों पर भी है, जहां तमाम कोशिशों के बावजूद बीजेपी जीत दर्ज नहीं कर पाती है। इनमें ग्वालियर, शिवपुरी, भोपाल, सतना जैसे जिलों की सीटें शामिल हैं। बीजेपी को लोकसभा में अगर अच्छा प्रदर्शन करना है तो चंबल-ग्वालियर, आगर-मालवा और बुंदेलखंड जैसे क्षेत्रों को भी ध्यान में रखना होगा।

इस फार्म्युले पर हो रहा काम
बीजेपी हाईकमान और प्रदेश कार्यसमिति इस बात पर राजी है कि हर लोकसभा सीट से एक मंत्री बनाया जाए। इस फार्म्युले के हिसाब से मध्य प्रदेश में 29 लोकसभा की सीटें हैं, तो 29 मंत्री बनाए जा सकते हैं। इनमें भी नए चेहरों को तरजीह मिलेगी। इसके अलावा 2018 में कमलनाथ सरकार की तरह स्वतंत्र प्रभार मंत्री न बनाकर सभी को कैबिनेट मंत्री का दर्जा मिल सकता है। नियम के अनुसार मध्य प्रदेश में 35 मंत्री बनाए जा सकते हैं। इसमें सीएम और 2 डेप्युटी सीएम को गिन लिया जाए तो कुल 32 मंत्री हो जाएंगे। 3 पदों को खाली रखा जाएगा।

किस गुट को मिलेगी प्राथमिकता
पिछली सरकार में शिवराज सिंह खुद मुख्यमंत्री थे। उन्होंने समर्थक विधायकों को मंत्री नहीं बनाया। अब जब वह सीएम नहीं हैं, तो पार्टी को उनके समर्थक विधायकों का भी ध्यान रखना है। इसके अलावा सिंधिया गुट, उमा भारती गुट, कैलाश विजयवर्गीय, प्रह्लाद पटेल सबके अपने समर्थक विधायक हैं। देखना ये होगा कि पार्टी किस गुट को प्राथमिकता देती है।

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