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केंद्र से टकराव के बीच कैसे नया मोर्चा खोल रहे हैं स्टालिन, राज्य की स्वायत्तता के लिए बनाई हाई-लेवल कमेटी

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नई दिल्ली

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने एक बड़ा कदम उठाया है। उन्होंने राज्य की स्वायत्तता के लिए एक उच्च-स्तरीय समिति बनाई है। यह समिति केंद्र सरकार के साथ बढ़ते तनाव के बीच बनाई गई है। मुख्यमंत्री स्टालिन का कहना है कि केंद्र सरकार लगातार राज्यों के अधिकारों में दखल दे रही है। इसलिए, राज्य की स्वायत्तता को बचाने के लिए यह कदम उठाया गया है। इस पैनल की अगुवाई सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस कुरियन जोसेफ करेंगे। यह पैनल केंद्र और राज्य सरकारों के बीच संबंधों का गहराई से अध्ययन करेगा।

राज्य की स्वायत्तता की रक्षा उद्देश्य
इस समिति का मुख्य उद्देश्य राज्य की स्वायत्तता की रक्षा करना बताया गया है। स्टालिन ने राज्य विधानसभा को बताया कि पैनल जनवरी 2026 में एक अंतरिम रिपोर्ट देगा। इसके बाद, दो साल के भीतर अंतिम रिपोर्ट और सिफारिशें पेश की जाएंगी। इसके माध्यम से राज्य सरकार अपने अधिकारों को और मजबूत करना चाहती है।

गवर्नर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद कदम
यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है, जब राज्य विधानसभा से पारित 10 बिलों को राज्यपाल की मंजूरी के बिना ही कानून मान लिया गया है। यह सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के बाद संभव हुआ है। 8 अप्रैल को, सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि राज्यपाल आरएन रवि का 10 बिलों पर सहमति रोकना ‘गैरकानूनी’ था। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जेबी पारदीवाला और आर महादेवन की बेंच ने कहा कि राज्यपाल संवैधानिक रूप से राज्य विधानसभा की सलाह पर काम करने के लिए बाध्य हैं।

केंद्र और राज्य के संबंधों पर अध्ययन
अब स्टालिन सरकार ने स्वायत्तता पर विचार के लिए जो कमेटी बनाई है, उसमें पूर्व ब्यूरोक्रेट अशोक वर्धन शेट्टी और राज्य योजना आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष एम नागनाथन भी सदस्य होंगे। मुख्यमंत्री ने कहा, ‘कमेटी उन विषयों को राज्य सूची से कानून के अनुसार समवर्ती सूची में स्थानांतरित करने का अध्ययन करेगी।’ उन्होंने यह भी कहा कि राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नेशनल इलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट-NEET) राज्यों के अधिकार क्षेत्र से बाहर है। स्टालिन ने राज्य विधानसभा में कहा, ‘यह कमेटी रिसर्च करेगी और राज्य और केंद्र सरकार के बीच संबंधों को मजबूत करने के लिए अपनी सिफारिशें देगी।’

सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को दी है राहत
सुप्रीम कोर्ट ने अपने हालिया फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि अगर कोई बिल राज्य विधानसभा द्वारा दोबारा विचार के बाद फिर से पेश किया जाता है, तो राज्यपाल को उस पर सहमति देनी होगी। जब तक कि बिल में कोई बड़ा बदलाव न हो। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, ‘राज्यपाल द्वारा 10 बिलों को राष्ट्रपति के लिए सुरक्षित रखना गैरकानूनी और मनमाना है। इसलिए, इस कार्रवाई को रद्द किया जाता है। राज्यपाल द्वारा 10 बिलों के लिए की गई सभी कार्रवाइयां रद्द की जाती हैं। ये 10 बिल उस तारीख से पास माने जाएंगे, जब उन्हें राज्यपाल को दोबारा पेश किया गया था’।

स्टालिन ने राज्यों के लिए माना बड़ी जीत
इनमें से कुछ बिल तो 2020 से ही अटके हुए थे। 8 अप्रैल को विधानसभा में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को साझा करते हुए, स्टालिन ने इसे एक ऐतिहासिक क्षण और सभी भारतीय राज्यों के लिए सामूहिक जीत बताया। उन्होंने कहा, ‘मैं इस सदन को एक अच्छी खबर के बारे में बताना चाहता हूं। हमारी तमिलनाडु सरकार को एक ऐतिहासिक फैसला मिला है। राज्यपाल ने इस विधानसभा में पारित कई बिलों को बिना सहमति दिए वापस कर दिया था।’ उन्होंने आगे कहा, ‘तमिलनाडु सरकार ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में मामला दायर किया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि राज्यपाल द्वारा बिल को रोकना गैरकानूनी है। सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला दिया है। यह न केवल तमिलनाडु के लिए बल्कि भारत के सभी राज्यों के लिए एक बड़ी जीत है। यह फैसला सभी राज्य सरकारों के लिए एक जीत है।’

NEET और तीन भाषा नीति का भी विरोध
इससे पहले स्टालिन ने 4 अप्रैल को तमिलनाडु विधानसभा को बताया था कि राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा-NEETसे छूट मांगने के राज्य के प्रस्ताव को राष्ट्रपति ने खारिज कर दिया है। उन्होंने इस फैसले की कड़ी आलोचना करते हुए इसे ‘संघवाद में एक काला अध्याय’ बताया। मुख्यमंत्री ने राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (NEET) और राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के तहत तीन-भाषा फॉर्मूले का विरोध किया। उन्होंने कहा कि NEET के कारण कई छात्रों की जान चली गई है।

स्टालिन ने कहा, ‘हमने NEET परीक्षा के कारण कई छात्रों को खो दिया है। हमने लगातार NEET परीक्षा का विरोध किया है। त्रिभाषा नीति के नाम पर केंद्र सरकार तमिलनाडु में हिंदी थोपने की कोशिश कर रही है।’ उन्होंने आरोप लगाए, ‘चूंकि हमने NEP को अस्वीकार कर दिया है, इसलिए केंद्र सरकार द्वारा राज्य को 2500 करोड़ रुपये जारी नहीं किए गए हैं।’ उन्होंने यह भी मांग की कि शिक्षा को राज्यों का विशेष विषय बनाया जाए। उन्होंने 42वें संवैधानिक संशोधन को रद्द करने की मांग की, जिसने शिक्षा को समवर्ती सूची में स्थानांतरित कर दिया था।

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