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‘मैं पाकिस्तान में भारत का जासूस था…’ 10 लाख के लिए 30 साल लंबी लड़ाई, थ्रिलर फिल्म जैसी है महमूद की कहानी

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नई दिल्ली

ये एक ऐसी कहानी है जिसमें जासूसी पर बनी रहस्य-रोमांच से भरपूर किसी मूवी के सारे एलिमेंट हैं। एक शख्स ने दावा किया कि वह जासूस था और पाकिस्तान में उसने दो बड़े ऑपरेशन में हिस्सा लिया था। लेकिन 1976 में तीसरे मिशन के दौरान पकड़ लिया गया। वहां वह 13 साल तक जेल में रहा लेकिन सजा पूरी करने के बाद जब वह वतन लौटा तो सरकार ने उसे पहचानने से ही इनकार कर दिया। किसी भी आधिकारिक रिकॉर्ड में उसका नाम नहीं था।

वतन वापसी के 30 साल बाद आखिरकार मिला इंसाफ
भारत आने के 30 साल बाद और लंबी कानूनी लड़ाई लड़ाई के बाद इस ‘पूर्व जासूस’ को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। राजस्थान के कोटा में रहने वाले और अब 75 साल के हो चुके शख्स को अब इंसाफ मिला है। सीजेआई यूयी ललित और जस्टिस एस. रविंद्र भट की बेंच ने केंद्र सरकार को आदेश दिया है कि वह ‘पूर्व जासूस’ को 10 लाख रुपये का भुगतान करे।

डाक विभाग के कर्मचारी थे महमूद अंसारी
महमूद अंसारी ने 1966 में डाक विभाग को जॉइन किया था। ऐडवोकेट समर विजय सिंह के जरिए दाखिल की गई याचिका के मुताबिक, जून 1974 में उन्हें स्पेशल ब्यूरो ऑफ इंटेलिजेंस की तरफ से देश के लिए सीक्रेट ऑपरेशन चलाने की पेशकश की गई। उन्होंने पेशकश कबूल कर ली। डाक विभाग ने भी रिक्वेस्ट को मंजूर कर लिया और उन्हें विभाग की जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया गया।

1976 में पाकिस्तान में पकड़े गए, 14 साल जेल हुई
पिटिशन के मुताबिक, अंसारी को पाकिस्तान में एक ‘खास मिशन’ को अंजाम देने की जिम्मेदारी दी गई। तीसरे मिशन के दौरान पाकिस्तानी रेंजर्स ने उन्हें पहचान लिया। 23 दिसंबर 1976 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। पाकिस्तान के ऑफिशल सीक्रेट्स ऐक्ट के तहत उनके खिलाफ मुकदमा चला और 14 साल कैद की सजा सुनाई गई। जेल में रहने के दौरान अंसारी ने अपने विभाग को कई खत लिखे और बताया कि वह अभी पाकिस्तान की कैद में है। खत में उन्होंने यह भी गुहार लगाई कि उनकी गैरहाजिरी को ड्यूटी से जानबूझकर गैरहाजिर होना न माना जाए। उनका दावा है कि विभाग ने 31 जुलाई 1980 को बिना उनका पक्ष सुने बर्खास्त कर दिया।

1980 में डाक विभाग ने बर्खास्त कर दिया
1989 में, अपनी रिहाई के बाद वतन वापस आए अंसारी को अपनी बर्खास्तगी के बारे में पता चला। उन्होंने केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण, जयपुर में अपनी बर्खास्तगी को चुनौती दी। जुलाई 2000 में ट्राइब्यूनल ने दाखिल करने में देरी के कारण उनके आवेदन पर विचार करने से इनकार कर दिया। उसी साल सितंबर में कैट ने उनकी रिव्यू पिटीशन को भी खारिज कर दिया था। उन्होंने डाक निदेशालय, डाक भवन, नई दिल्ली के पोस्टल बोर्ड के सदस्य को अपील दायर की लेकिन वहां भी उन्हें राहत नहीं मिली। अक्टूबर 2006 में, डाक विभाग ने सेवा से उनकी बर्खास्तगी को बरकरार रखा।

कैट से लेकर हाई कोर्ट तक नहीं मिली राहत
2007 में, अंसारी वापस कैट जयपुर में चले गए, जिसने उनके आवेदन को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यह बनाए रखने लायक नहीं है। 2008 में, उन्होंने हाई कोर्ट का रुख किया, लेकिन वहां भी उन्हें राहत नहीं मिली। 2017 में हाई कोर्ट ने ज्युरिशडिक्शन और मैंटेनिबिलिटी के आधार पर उनकी याचिका खारिज कर दी। 2018 में अंसारी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

अडिशनल सॉलिसिटर जनरल ने बताया ‘मनगढ़ंत’ कहानी
इस मामले में सरकार की तरफ से अडिशनल सॉलिसिटर जनरल विक्रमजीत बनर्जी सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए। उन्होंने अंसारी के दावे को काल्पनिक कहानी करार दिया। लेकिन अदालत ने उनसे पूछा कि अंसारी को पोस्ट ऑफिस की नौकरी से इतनी लंबी छुट्टी क्यों दी गई? कोर्ट ने उनसे इस दावे के खंडन के लिए जरूरी दस्तावेज भी पेश करने को कहा कि अंसारी को पाकिस्तान में ऑपरेशन के दौरान पहले भी छुट्टी दी गई थी। इस पर एएसजी ने कहा कि 40 साल पुराने रिकॉर्ड को पाना बहुत मुश्किल है।

आखिरकार सुप्रीम कोर्ट से मिला इंसाफ
इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह तो सभी देशों में एक सामान्य परिपाटी है कि अगर उनके अपने लोग किसी विदेशी धरती पर सीक्रेट मिशन को अंजाम देते वक्त पकड़े जाए, तो उसे अपना मानने से ही इनकार कर देते हैं। कोर्ट ने पहले तो सरकार को 5 लाख रुपये की अनुग्रह राशि देने को कहा। बाद में जब याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि उनके मुवक्किल की उम्र 75 साल है और आय का कोई स्रोत भी नहीं है तो राशि को बढ़ाकर 10 लाख रुपये कर दिया।

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