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जजों की मौखिक टिप्पणी क्या कानून के बराबर है? चंद्रचूड़ ने सर्वे को लेकर कही थी ये बात

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नई दिल्ली

ज्ञानवापी मामले की सुनवाई के दौरान तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने एक मौखिक टिप्पणी की थी.इस टिप्पणी के बाद मस्जिदों के नीचे मंदिरों के अस्तित्व की जांच के लिए सर्वे कराए जाने की मांग की झड़ी सी लग गई है. उत्तर प्रदेश के संभल में शाही जामा मस्जिद के सर्वे के लिए ट्रायल कोर्ट ने एडवोकेट कमिश्नर को नियुक्त किया था. 19 नवंबर के बाद 24 नवंबर को हुए दूसरे सर्वे के दौरान संभल में हिंसा भड़की.

इस के बाद एक अन्य अदालत ने राजस्थान के अजमेर शरीफ़ दरगाह के नीचे मंदिर के अस्तित्व का पता लगाने के लिए सर्वे कराने की मांग वाली एक याचिका को स्वीकार कर लिया. मथुरा की शाही ईदगाह मस्जिद और वाराणसी के ज्ञानवापी मस्जिद में सर्वे के लिए दायर याचिकाओं पर आए फ़ैसलों के बाद अब उत्तर प्रदेश और राजस्थान की निचली अदालतों के इन फ़ैसलों ने क़ानूनी जानकारों को निराश किया है.

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने बीबीसी हिंदी से कहा, “एक मौखिक टिप्पणी (तत्कालीन सीजेआई की) क़ानून नहीं बन सकती.” लेकिन उत्तर प्रदेश और राजस्थान के इन दोनों मामलों के याचिकाकर्ता और ‘हिंदू राष्ट्रीय सेना’ नाम की संस्था के अध्यक्ष विष्णु गुप्ता इससे निश्चित हैं.

उन्होंने बीबीसी हिंदी से कहा, “हम ऐसी कोई भी जगह नहीं छोड़ेंगे जहां मस्जिद है. इसके बाद दिल्ली के जामा मस्जिद का नंबर होगा. उत्तर प्रदेश में ऐसी बहुत सारी जगहें हैं. हम सरकार से कहेंगे कि मस्जिदों को मंदिर घोषित कर दिया जाए.”विष्णु गुप्ता के विचार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत के बयान से उलट हैं.मोहन भागवत ने 2 जून 2022 को लोगों से कहा था, “हर मस्जिद में शिवलिंग ढूंढने की ज़रूरत नहीं है.”

जस्टिस चंद्रचूड़ की मौखिक टिप्पणी क्या थी?
भारत के पिछले चीफ़ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने ज्ञानवापी मामले की सुनवाई के दौरान मई 2022 में एक मौखिक टिप्पणी की थी.उन्होंने कहा था कि प्लेसेस ऑफ़ वर्शिप एक्ट 1991 (उपासना स्थल अधिनियम) 15 अगस्त 1947 की स्थिति के अनुसार, किसी भी संरचना के धार्मिक चरित्र की “जांच करने” पर रोक नहीं लगाता है.

उपासना स्थल अधिनियम उस समय अस्तित्व में आया, जब राम जन्मभूमि आंदोलन चरम पर था. सुप्रीम कोर्ट ने इस अधिनियम को संवैधानिक मान्यता देते हुए इसे वैध ठहराया था.सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यह अधिनियम दर्शाता है, “इतिहास और उसकी ग़लतियों का इस्तेमाल वर्तमान और भविष्य को दबाने के हथियार के रूप में नहीं किया जाएगा.”

लेकिन तत्कालीन चीफ़ जस्टिस की अध्यक्षता वाली पांच जजों की बेंच ने ज्ञानवापी की मस्जिद कमिटी से कहा था कि वो अपनी आपत्तियां ट्रायल कोर्ट के सामने दायर करे.तत्कालीन सीजेआई की इस मौखिक टिप्पणी को ट्रायल कोर्ट और बाद में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने क़ानूनी अधिकार के तौर पर लिया.इन अदालतों ने कहा कि पूजा स्थल अधिनियम के तहत इस तरह के मामलों पर रोक नहीं है. इसके बाद मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह मामले में भी सुनवाई को जारी रखने की मंजूरी मिली.

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