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जस्टिस वर्मा की और बढ़ी मुश्किलें! बार एसोसिएशनों ने आपराधिक जांच की उठाई मांग, CJI से ये अपील

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नई दिल्ली

जस्टिस यशवंत वर्मा के मामले में नया मोड़ आया है। कई बार एसोसिएशन ने सीजेआई संजीव खन्ना से एक संयुक्त बयान में खास अपील की है। उन्होंने जस्टिस वर्मा के खिलाफ आपराधिक जांच शुरू करने और इलाहाबाद हाई कोर्ट में उनके ट्रांसफर की सिफारिश वापस लेने की मांग की है। यह मामला जस्टिस वर्मा के बंगले में आग के बाद मिली नकदी से जुड़ा है। बार एसोसिएशनों ने देश के मुख्य न्यायाधीश से पारदर्शिता बनाए रखने के लिए धन्यवाद दिया है। उन्होंने दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस की रिपोर्ट को सार्वजनिक करने के लिए भी सराहना की है।

बार एसोसिएशन की सीजेआई से डिमांड
दिल्ली, इलाहाबाद, केरल, कर्नाटक और गुजरात हाई कोर्ट के बार एसोसिएशन के अध्यक्षों ने यह बयान जारी किया है। उन्होंने सीजेआई संजीव खन्ना से अपील में कहा कि जस्टिस यशवंत वर्मा के ट्रांसफर को रद्द किया जाए। उनसे सभी प्रशासनिक काम वापस लेने का अनुरोध किया गया है। इसके साथ ही, उन्होंने मांग की है कि जस्टिस वर्मा के खिलाफ आपराधिक कानून के तहत कार्रवाई शुरू की जाए, जैसे कि किसी भी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ की जाती है।

क्या जस्टिस वर्मा पर दर्ज होगी FIR?
बार एसोसिएशनों का कहना है कि दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस की रिपोर्ट के अनुसार, ‘किसी ने 15.3.2025 को परिसर से सामान हटाया था और अगर आपराधिक कानून लागू किया गया होता, तो सबूत नष्ट नहीं होते।’ उनका मानना है कि सबूतों को नष्ट किया गया है। इस तरह के अपराधों में कई लोग शामिल हो सकते हैं। ऐसे में FIR दर्ज न करना उनके खिलाफ कार्रवाई को मुश्किल बना देगा।

इलाहाबाद ट्रांसफर का भी विरोध
बार एसोसिएशन के अध्यक्षों ने इलाहाबाद में मिलने का फैसला किया है। अगर जस्टिस यशवंत वर्मा के ट्रांसफर का आदेश वापस नहीं लिया जाता है, तो वे इलाहाबाद हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के साथ एकजुटता दिखाएंगे। उनका मकसद है कि उच्च न्यायपालिका के न्यायाधीशों के लिए जवाबदेही के मानक तय किए जाएं। वे 1999 में सुप्रीम कोर्ट की ओर से तय की गई इन-हाउस प्रक्रिया और 1997 में अनुमोदित न्यायिक जीवन के मूल्यों के पुन: विवरण और 2002 के बैंगलोर सिद्धांतों का पुनर्मूल्यांकन करना चाहते हैं।

जस्टिस वर्मा मामले में PIL
इस मामले में एक PIL भी दायर की गई है। इसमें जस्टिस वर्मा के खिलाफ FIR दर्ज करने और CJI द्वारा गठित तीन सदस्यीय समिति को चुनौती दी गई है। जस्टिस वर्मा 21 मार्च को विवादों में आए थे। उनके बंगले के एक स्टोररूम में आग लगने के बाद नकदी के बोरे मिलने की खबरें आई थीं। CJI संजीव खन्ना ने 22 मार्च को एक तीन सदस्यीय समिति बनाई थी। यह समिति इन-हाउस प्रक्रिया के तहत मामले की जांच करेगी। यह फैसला दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस डीके उपाध्याय की रिपोर्ट के बाद लिया गया। रिपोर्ट में कहा गया था कि मामले की गहराई से जांच होनी चाहिए।

कैश मामले को जस्टिस वर्मा ने बताई साजिश
हालांकि, जस्टिस वर्मा ने नकदी रखने से इनकार किया है। उन्होंने इसे अपने खिलाफ साजिश बताया है। 24 मार्च को दिल्ली हाई कोर्ट ने जस्टिस वर्मा से न्यायिक काम वापस ले लिया था। यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर लिया गया था। उसी दिन, इलाहाबाद हाई कोर्ट बार एसोसिएशन ने जस्टिस यशवंत वर्मा को दिल्ली हाई कोर्ट से इलाहाबाद हाई कोर्ट में ट्रांसफर करने की सिफारिश के विरोध में 25 मार्च से अनिश्चितकालीन हड़ताल की घोषणा की थी।

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