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Tuesday, March 31, 2026
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भारत नेपाल सीमा की नो मेंस लैंड पर खड़े हो गए कई अवैध मदरसे, बस गईं नई बस्तियां

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श्रावस्ती

यूपी में मदरसों के सर्वे के बीच श्रावस्ती से चौकाने वाली खबर सामने आयी है। भारत-नेपाल की खुली सीमा से श्रावस्ती जिले का 62 किलोमीटर लंबा क्षेत्रफल सटा हुआ है। सीमा के दोनों ओर बीते पांच सालों में मस्जिद, मदरसे और बस्तियों की बाढ़ सी आ गई है। इस सीमा पर नो मेंस लैंड पर भी बस्तियां बस चुकी हैं। यहां के मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र भरथा, रोशन गढ़, ककरदरी जैसे कई गांव हैं, जहां नो मेंस लैंड पर मदरसे संचालित हैं। इन मदरसों के गेट तो भारत में खुलते है, लेकिन खिड़कियां भारत-नेपाल के नो मेंस लैंड में खुलती हैं।

यहां पर कुछ ऐसे मदरसे भी हैं, जहां कुछ बच्चे नेपाल से भी आकर दीनी तालीम लेते हैं। क्योंकि यहां पर किसी प्रकार की कोई रोक-टोक नहीं है। ऐसे में यहां एक कदम में भारत तो एक कदम में नेपाल में बड़ी आसानी से आ जा सकते हैं। अगर देखा जाए तो यहां के ज्यादातर मदरसे गैर मान्यता प्राप्त हैं। यहां के मुस्लिम समुदाय के लोग खुद पैसे जमा करके मौलवियों को तनखा देते हैं, और अपने बच्चों को दीनी तालीम दिलवाते हैं।

इसी सिलसिले में आज नवभारत टाइम्स की टीम भारत नेपाल सीमा पर बसे गांव ककरदरी पहुंची। ककरदरी गांव पहुंचकर हम यहां के मदरसा दारुल उलूम गुलशने रजा पहुचें जो नो मेंस लैंड से सटा हुआ मदरसा है। इसका मेन गेट नो मेंस लैंड के पिलर नंबर 12/640 में खुलता है। यहां पर 80 से ज्यादा बच्चे दीनी तालीम हासिल करते हैं। इन बच्चों को कुरान, अरबी, उर्दू तालीम दी जाती है। लेकिन यहां के मौलवी नफीस बताते हैं कि हम बच्चों को हिंदी इंग्लिश की भी तालीम देते हैं। जबकि एक मौलवी 80 बच्चों को हर सब्जेक्ट की तालीम कैसे दे सकता है। ऐसे में जब हमने बच्चों से बात की तो उनके पास ना हिंदी की किताब नजर आई ना अंग्रेजी की, सिर्फ दीनी तालीम देने वाली उर्दू और अरबी की किताबें दिखाई दीं।

लोगों से बात करते हुए जानकारी हुई कि यहां के कुछ बच्चे नेपाल के मदरसों में जाकर भी शिक्षा ले रहे हैं। मदरसा दारुल उलूम गुलशने रजा में कुछ दिन पहले तक नेपाल के एक मौलवी के द्वारा संचालन किया जा रहा था। अब वह मौलवी फिर नेपाल में जाकर लोगों को दीनी तालीम दे रहा है। गांव के ही लोग मौलवी को अपने पास से तनख्वाह देते हैं।

यहां पर कोई सरकारी मदद नहीं है। मौलवी नफीस बताते हैं कि 20 साल पहले ही इस मदरसे का रजिस्ट्रेशन कराया गया था। जब कागज मांगा गया तो वह रजिस्ट्रेशन का कोई कागजात न दिखा सके। यहां तक कि मौलवी साहब को यह भी नहीं पता कि मान्यता कहां से कराई जाती है। अब बड़ा सवाल ये है कि आखिर मदरसों में पढ़ने वाले इन बच्चों का मुस्तकबिल क्या होगा।

ककरदरी, रोशनगढ़, तुरम्मा, असनहरिया और कुंडवा जैसे कई गांव में नो मेंस लैंड पर बस्ती बनने का नजारा साफ नजर आता है। जैसे-जैसे बस्तियां बंटती जा रही हैं, दोनों देशों को अलग करने वाले शिलापट भी गायब होते जा रहे हैं। सिर्फ दो साल में ही चार फुट ऊंचा शिलापट महज नौ इंच बचा है। पूरे इलाके को पाटकर सघन आबादी बस गई है। वर्ष 2020 तक यहां झुग्गी झोपड़ियां थीं, आज पक्के मकान बन गए हैं। यहां मस्जिद के साथ-साथ 22 से अधिक मदरसे बन चुके हैं। एक मदरसे की मान्यता का भी दावा किया जा रहा है। अल्पसंख्यक समुदाय के इन लोगों के पास नेपाल की नागरिकता है तो भारत का आधार कार्ड भी ये दोनों देशों में बेखौफ घूमते हैं।

इस मामले पर जब हमने जिला अल्पसंख्यक अधिकारी देवेंद्र राम से बात की तो उन्होंने कहा कि श्रावस्ती के अलावा प्रदेश भर में मदरसों की जांच कराई गई है। सब की रिपोर्ट शासन को भेज दी गई है, जो भी कार्रवाई होगी शासन के द्वारा तय की जाएगी।

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