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मेरे स्पीच गांधीवादी सिद्धांत पर आधारित थे’, दिल्ली हाई कोर्ट में उमर खालिद बोला- मेरे खिलाफ हिंसा का कोई आरोप नहीं

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नई दिल्ली

दिल्ली दंगों (2020) के आरोपी उमर खालिद ने शुक्रवार को दिल्ली हाई कोर्ट के सामने अपना पक्ष रखा। उसने कहा कि मेरे खिलाफ हिंसा या धन जुटाने का कोई भी आरोप नहीं है। बता दें, उमर खालिद पर 2020 के दिल्ली दंगों की साजिश रचने का आरोप है। जिसकी वजह से खालिद अभी भी जेल की सलाखों के पीछे है।

उमर खालिद के वकील त्रिदीप पेस ने जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस शलिंदर कौर की खंडपीठ के समक्ष यह दलील दी। उमर के वकील ने दलील दी कि मामले के अन्य आरोपियों की तरह वह भी विचाराधीन कैदी के रूप में लंबे समय तक जेल में रहने के आधार पर जमानत की मांग कर रहे हैं। यह भी कहा गया कि खालिद मामले में पहले से ही जमानत प्राप्त चार सह-आरोपियों के साथ समानता का दावा कर रहा है।

वकील त्रिदीप पेस ने खालिद के खिलाफ लगे आरोपों का भी जिक्र किया और कहा, ‘मुझसे या मेरे कहने पर किसी भी तरह की कोई वसूली नहीं की गई। हिंसा की एफआईआर में मेरा कोई जिक्र नहीं है। किसी भी हिंसा में मेरी संलिप्तता दिखाने के लिए मुझसे या किसी और से कोई साक्ष्य नहीं लिया गया। खरीद, रसीद या धन जुटाने का कोई आरोप नहीं है। मेरी ओर से आतंकवादी कृत्य या किसी भी हिंसक कृत्य का कोई आरोप नहीं है। हिंसा को लेकर एकमात्र एफआईआर है जिसमें मुझे फंसाया गया था, मुझे बरी कर दिया गया है।”

पेस ने कहा कि खालिद की ओर से एकमात्र प्रत्यक्ष कृत्य महाराष्ट्र के अमरावती में दिया गया भाषण था। उन्होंने तर्क दिया कि इसमें हिंसा का आह्वान नहीं किया गया है। मैं दिल्ली से हजारों मील दूर था। भीड़ की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। यह अहिंसा के गांधीवादी सिद्धांतों का आह्वान करने वाला भाषण है और कह रहा है कि हमें इस कानून (नागरिकता संशोधन अधिनियम) का विरोध करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि किसी ने भी भाषण को सुनने की जहमत नहीं उठाई, बल्कि अभियोजन पक्ष ने केवल एक चुनिंदा क्लिप पर भरोसा किया “जो किसी राजनेता द्वारा प्रचारित किए जाने वाले आक्रोश के अनुकूल था”।

दिल्ली पुलिस द्वारा साक्ष्य के तौर पर व्हाट्सएप ग्रुपों की बातचीत के संबंध में पेस ने कहा कि वह तीन ग्रुपों का हिस्सा थे, लेकिन उनमें से दो पर उन्होंने कोई संदेश नहीं भेजा। इसके बाद उन्होंने तीसरे समूह में हुई बातचीत को संबोधित किया। अपने खिलाफ एक संदेश के बारे में उन्होंने कहा कि मैंने विरोध स्थल का स्थान तभी साझा किया जब किसी ने इसके बारे में पूछा।

पेस ने कहा कि जब खालिद बिहार में था, तो खालिद को दिल्ली पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी का फोन आया और उन्होंने पुलिस मुख्यालय पर विरोध प्रदर्शन को खत्म करने का अनुरोध किया, क्योंकि उन्होंने कहा कि स्थिति गंभीर है और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प दिल्ली का दौरा कर रहे हैं… मैंने यह संदेश ग्रुप पर साझा किया।

दिल्ली पुलिस का कहना है कि जिन बैठकों में साजिश रची गई उनके बारे में पेस ने कहा कि आपराधिक साजिश की कथित बैठक में सदस्य एक ही स्थान पर मौजूद भी नहीं थे। वे बेतरतीब ढंग से सीडीआर पढ़ रहे हैं और आरोपियों के स्थान की तुलना कर रहे हैं और कह रहे हैं कि ‘ठीक है ये लोग वहां मौजूद हैं’। दूसरी बैठकों में ऐसे और भी लोग हैं जो आरोपी भी नहीं हैं।”

पेस ने कहा कि कार्यकर्ता योगेंद्र यादव और अन्य व्यक्ति भी मौजूद थे लेकिन उन्हें आरोपी नहीं बनाया गया है। पेस ने कहा कि इन बैठकों में भाग लेने का आरोप है, तथा आपराधिकता का कोई आरोप नहीं है। उन्होंने कहा कि बैठक का समर्थन करने वाले तीन बयानों में यह नहीं कहा गया है कि हिंसा की कोई तैयारी है। बैठक के गुप्त होने के दावे पर पेस ने कहा कि बैठक की तस्वीर फेसबुक पर थी और इसमें कुछ भी गुप्त नहीं था। उन्होंने कहा कि बैठक में शामिल सह-आरोपियों को पहले ही जमानत मिल चुकी है।

पेस ने यह भी दलील दी कि अभियोजन पक्ष का यह आरोप कि समूह में शामिल लोगों के बीच कई बार कॉल हुई, इस बात का जवाब नहीं देता कि कॉल के दौरान लोगों ने क्या कहा। उन्होंने कहा कि कई लोगों ने फोन किया था, उनमें से कुछ को आरोपी बनाया गया, कुछ को नहीं।

बता दें, खालिद को सितंबर 2020 में गिरफ्तार किया गया था और उस पर आपराधिक साजिश, दंगा, गैरकानूनी सभा के साथ-साथ गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत कई अन्य अपराधों का आरोप लगाया गया था। तब से वह जेल में है। यह दूसरी बार है जब उसने जमानत के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।

ट्रायल कोर्ट ने पहली बार मार्च 2022 में उन्हें जमानत देने से इनकार कर दिया था। इसके बाद उन्होंने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जिसने अक्टूबर 2022 में भी उन्हें राहत देने से इनकार कर दिया, जिसके बाद उन्हें शीर्ष अदालत में अपील दायर करनी पड़ी।

मई 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दिल्ली पुलिस से जवाब मांगा था। उसके बाद सुप्रीम कोर्ट में उनकी याचिका पर 14 बार सुनवाई स्थगित की गई। 14 फरवरी 2024 को उन्होंने परिस्थितियों में बदलाव का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट से अपनी जमानत याचिका वापस ले ली।

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बेला एम त्रिवेदी और जस्टिस पंकज मिथल की खंडपीठ ने 14 फरवरी को इस मामले की सुनवाई करने वाली थी, जब खालिद के वकील वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने अदालत को सूचित किया कि जमानत याचिका वापस ली जा रही है। सिब्बल ने कहा था कि परिस्थितियों में बदलाव के कारण हम अपना मामला वापस लेना चाहते हैं और उचित राहत के लिए निचली अदालत में जाना चाहते हैं। 28 मई को ट्रायल कोर्ट ने उनकी दूसरी जमानत याचिका खारिज कर दी, जिसके बाद उन्होंने हाई कोर्ट में अपील दायर की।

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