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न थका हूं, न ही रिटायर हुआ हूं… अटल बिहारी वाजपेयी ने कब और क्यों कही ये बात जिसे शरद पवार ने दोहराया

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नई दिल्‍ली

न थका हूं, न रिटायर हुआ हूं… भतीजे अजित पवार को जवाब देने के लिए शनिवार को शरद पवार ने इन शब्‍दों का इस्‍तेमाल किया। ये शब्‍द किसी और के नहीं, बल्कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के थे। कभी इन शब्‍दों का इस्‍तेमाल कर अटल जी ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) के तमाम नेताओं को चौंकाया था। यह वह दौर था जब अटल बिहारी वाजपेयी के संन्‍यास लेने की अटकलें तेज हो गई थीं। लालकृष्‍ण आडवाणी के हाथों में बीजेपी की कमान थी। वाजपेयी के नेतृत्‍व में उस वक्‍त बीजेपी को संयुक्‍त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) से चुनाव में हार का सामना करना पड़ा था। अटल बिहारी वाजपेयी ने क्‍यों ये बात कही थी? तब क्‍या हालात बन गए थे? आइए, यहां जानते हैं।

2004 की बात है। बीजेपी को कांग्रेस के नेतृत्‍व वाले एनडीए से आम चुनाव में करारी शिकस्‍त मिली थी। बीजेपी ने अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई में यह चुनाव लड़ा था। चुनाव में हार के बाद मुंबई में बीजेपी राष्‍ट्रीय परिषद की बैठक हुई। इसमें तय हुआ कि लालकृष्‍ण आडवाणी नेता प्रतिपक्ष और पार्टी अध्यक्ष दोनों रहेंगे। तब कयास लगने लगे थे कि अटल बिहारी वाजपेयी जल्‍द ही रिटायरमेंट का ऐलान कर देंगे। इस तरह की कयासबाजी के पीछे और भी कई कारण थे। इनमें से एक अटल जी का स्‍वास्‍थ्‍य भी था। लेकिन, अक्‍टूबर में हुई राष्‍ट्रीय परिषद की इस बैठक में उन्‍होंने सबको चौंका दिया। उसी बैठक में उन्‍होंने कहा था कि वह न तो थके हैं न ही रिटायर हुए हैं।

यूपीए पर क‍िया था हमला
बीजेपी में संन्‍यास की अटकलों के बीच अटल जी बोले थे – न मैं थका हूं न रिटायर हुआ हूं। उन्‍होंने यूपीए पर प्रहार भी किया था। वह बोले थे कि मनमोहन सरकार में कई तरह के विरोधाभास हैं। वह अस्थिर है। जल्‍दी ही यूपीए सरकार गिर जाएगी। पार्टी के कार्यकर्ताओं को मध्‍यावधि चुनाव के लिए तैयार रहना चाहिए।

2004 का यह वह दौर था जब लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी का एक गुट वाजपेयी तो दूसरा आडवाणी को प्रधानमंत्री बनते देखना चाहता था। हालांकि, वाजपेयी के ‘न थका हूं न रिटायर हुआ हूं’ वाले बयान के बाद पार्टी में हलचल मच गई थी। इसके बाद पार्टी ने वाजपेयी के ही नेतृत्‍व में चुनाव में जाने का फैसला किया था।

आडवाणी ने अटल को रखा आगे
वाजपेयी की इस स्‍पीच में एक मैसेज क्‍लीयर था। बीजेपी के दूसरे नेताओं की तरह उन्‍होंने आडवाणी का नेतृत्‍व स्‍वीकार लिया था। लेकिन, संन्‍यास नहीं लिया था। यह 1996 जैसा था। तब आडवाणी ने बिना सवाल किए वाजपेयी को प्रधानमंत्री के तौर पर प्रोजेक्‍ट करने के आरएसएस के फैसले को मान लिया था। बीजेपी बाबरी मस्जिद विवाद के बाद लगातार मजबूत होती गई थी। 1996 में वह सरकार बनाने के बेहद करीब आ गई थी। तब आडवाणी को बैकसीट में जाना पड़ा था। वह बखूबी जानते थे कि वाजपेयी पार्टी का उदार चेहरा हैं। उनको आगे रखकर दूसरी पार्टियों को जोड़ा जा सकता है।

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