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सुरसा बना चीन! कई देशों की जमीन हड़पने का मेगाप्‍लान, भारत को महाबली न बनाया तो डूबेंगे सब

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नई दिल्‍ली

चीन की नजर अकेले भारत की जमीन पर नहीं है। वह दुनियाभर में कब्‍जाखोरी का प्‍लान बना चुका है। उसकी नीयत ‘साहेल’ पर भी खराब हो गई है। साहेल विशाल अफ्रीकी क्षेत्र है। यह उत्तर में सहारा रेगिस्तान और दक्षिण में सवाना को अलग करता है। लाल सागर के जरिये यह पश्चिम में पूरब तक फैला है। मॉरिटानिया, बुर्किना फासो, माली, नाइजर, चाड, सूडान और सेनेगल ‘साहेल’ क्षेत्र का हिस्सा हैं। यह क्षेत्र बॉक्साइट, मैंगनीज, फॉस्फेट, आयरन ओर, गोल्‍ड और पेट्रोलियम सहित खनिज संसाधनों से लबालब है। यह और बात है कि ‘साहेल’ आज दुनिया के सबसे गरीब क्षेत्रों में से एक है। खराब प्रशासन, भ्रष्टाचार और हिंसक अतिवाद जैसे कारणों के चलते यह क्षेत्र अपने प्राकृतिक संसाधनों का पूरी तरह से लाभ नहीं उठा पाया है। विकसित दुनिया खासतौर से पूर्व उपनिवेशवादियों ने भी इस क्षेत्र के देशों को हमेशा गरीब बनाए रखने में भूमिका निभाई है। चीन इन देशों की बदहाली का फायदा उठाने के चक्‍कर में है।

साहेल में बन रहे नए समीकरणों के बारे में विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन के सीनियर रिसर्च एसोसिएट समीर भट्टाचार्य ने फर्स्‍टपोस्‍ट में एक लेख लिखा है। लेख में उन्‍होंने बताया है क‍ि साहेल क्षेत्र कई लिहाज से अहम है। परमाणु ऊर्जा के उत्पादन में महत्वपूर्ण यूरेनियम, नाइजर में प्रचुर मात्रा में है। चौथा सबसे बड़ा वैश्विक यूरेनियम भंडार होने के बावजूद वहां परमाणु ऊर्जा उत्पन्न करने के लिए संयंत्र का अभाव है। दूसरी ओर फ्रांसीसी कंपनी अरेवा देश के लिए बिजली पैदा करने के लिए इसका इस्तेमाल करती रही है।

भू-राजनीतिक रूप से यह भीड़भाड़ वाला जटिल क्षेत्र है। सुरक्षा और विकास की पहल में यहां सात से ज्‍यादा शक्‍त‍िशाली देश शामिल हैं। कई अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय सैन्य मिशन हैं। फ्रांस इस क्षेत्र में सबसे शक्तिशाली है। इसके बाद अमेरिका का नंबर आता है। रूस ने हाल ही में एक निजी सैन्य फर्म वैगनर के जरिये इस क्षेत्र में प्रवेश किया है। साहेल में तुर्की भी एक प्रमुख प्‍लेयर है। वह यहां के हालातों को भुनाने की कोशिश कर रहा है। साहेल में अपनी भागीदारी बढ़ाने के बावजूद चीन अभी भी इस क्षेत्र में तुलना में कम है।

चीन धीरे-धीरे बढ़ा रहा है पैठ
चाड का सबसे वैल्‍यूएबल एक्‍सपोर्ट कच्चा तेल है। इसे वह मुख्य रूप से चीन को बेचता है। 2003 से चाइना नेशनल पेट्रोलियम कंपनी ने चाड में तेल उत्पादन का प्रबंधन किया है। इसके अलावा इस क्षेत्र में विशेष रूप से नाइजर में यूरेनियम की काफी मात्रा है। चीन ने अकेले नाइजर में तेल उद्योग में पर्याप्त निवेश किया है। चीन नाइजर में एग्डेम रिफ्ट बेसिन ऑयलफील्ड को बेनिन में सेमे-क्राके बंदरगाह से जोड़ने वाली कच्चे तेल की पाइपलाइन का निर्माण कर रहा है। चीन कई यूरेनियम एक्‍स्‍ट्रैक्‍शन संबंधी निर्माण योजनाएं भी शुरू कर रहा है। उदाहरण के लिए चाइना नेशनल न्यूक्लियर कॉरपोरेशन (सीएनएनसी) और नाइजर सरकार अजेलिक खदान को संचालित करने के लिए मिलकर काम कर रहे हैं। साहेल में चीन ने अपनी भूमिका को लो प्रोफाइल बनाए रखा है। उसकी प्राथमिक चिंता क्षेत्र में रहने और काम करने वाले लाखों चीनी नागरिकों की सुरक्षा के साथ निवेश पर है।

भारत के ल‍िए भी अहम है यह क्षेत्र
यह संसाधन संपन्न क्षेत्र भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है। भारत अपनी क्रूड की जरूरत का लगभग 20 फीसदी अफ्रीका से खरीदता है। उस तेल का लगभग आधा उत्पादन वहां होता है। नाइजीरिया भारत के लिए अफ्रीका का सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता है। भारत ने पहली बार 2001 में नाइजीरियाई तेल में रुचि ली थी। अब वह अमेरिका की तुलना में अधिक नाइजीरियाई तेल का आयात करता है। नाइजीरिया के अलावा भारत घाना और नाइजर के साथ ऊर्जा कूटनीति पर विचार कर रहा है।

क्‍यों भारत को सपोर्ट करने की है जरूरत?
साहेल में चीन की डिप्लोमेसी स्पष्ट रूप से सफल हो रही है। वह एक अन्य अफ्रीकी क्षेत्र में भारत को हरा रहा है। साहेल क्षेत्र में चीन की बढ़ती शक्ति और प्रभाव भारत के लिहाज से अच्‍छा नहीं है। जैसे-जैसे इस क्षेत्र में चीन का कद बढ़ेगा अमेरिका और बाकी पश्चिम देशों को चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। अमेरिका और उसके सहयोगी लंबे समय से चीन का सामना करने के लिए भारत से मदद मांगते रहे हैं। भारत अभी भी सैन्य और आर्थिक शक्ति के मामले में चीन के बराबर नहीं है। शायद यही कारण है कि भारत इस क्षेत्र में चीन के प्रति नरम है। अंतरराष्‍ट्रीय समुदाय को इस क्षेत्र में और ज्‍यादा सक्रिय होने और चीन को काउंटर बैलेंस के लिए भारत का समर्थन करना होगा।

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