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ये कट्टर मानसिकता… कश्मीर पर पाकिस्तान के दावे को लेकर यूएन में भारत ने सुनाई खरी-खरी

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नई दिल्ली:

भारत ने यूएन में एक बार फिर पाकिस्तान को कश्मीर के मुद्दे पर खरी खरी सुनाई। यूएन में भारत के स्थायी प्रतिनिधि वथनेनी हरीश ने इस्लामोफोबिया विरोधी दिवस पर एक महत्वपूर्ण बयान दिया। उन्होंने पाकिस्तान द्वारा जम्मू-कश्मीर पर किए गए अनुचित दावों को सिरे से खारिज कर दिया। साथ ही, उन्होंने भारत की विविधता, धार्मिक सहिष्णुता और सभी धर्मों के प्रति सम्मान पर जोर दिया। उन्होंने पाकिस्तान की कट्टर मानसिकता की निंदा की और दोहराया कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और रहेगा।

‘भारत में 20 करोड़ से ज्यादा मुस्लिम’
न्यूऑर्क में आयोजित यूएन की एक समिट में परवथनेनी हरीश ने अपनी बात रखी। उन्होंने पाकिस्तान के जम्मू-कश्मीर पर गैर-वाजिब दावे को खारिज करते हुए भारत की विविधता और बहुलवाद पर जोर दिया, जहां 20 करोड़ से ज़्यादा मुस्लिम रहते हैं। उन्होंने कहा भारत मुसलमानों के खिलाफ धार्मिक असहिष्णुता की घटनाओं की निंदा करने में यूएन के साथ एकजुटता से खड़ा है।”

पाकिस्तान के पूर्व विदेश सचिव को सुनाया
हरीश ने पाकिस्तान के पूर्व विदेश सचिव द्वारा जम्मू-कश्मीर पर की गई टिप्पणी पर कड़ी प्रतिक्रिया जताई। उन्होंने कहा, “अपनी आदत के अनुसार, पाकिस्तान के पूर्व विदेश सचिव ने आज भारतीय केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर का गलत जिक्र किया है। बार-बार जिक्र करने से न तो उनका दावा मान्य होगा और न ही सीमा पार आतंकवाद की उनकी गतिविधियों को उचित ठहराया जा सकेगा।”

‘जम्मू-कश्मीर भारत का हिस्सा था और हमेशा रहेगा’
उन्होंने पाकिस्तान की कट्टरपंथी मानसिकता पर भी निशाना साधा। हरीश ने स्पष्ट रूप से कहा, “इस राष्ट्र की कट्टर मानसिकता जग जाहिर है, साथ ही कट्टरता का इसका रिकॉर्ड भी। इस तरह के प्रयास इस वास्तविकता को नहीं बदलेंगे कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग था, है और हमेशा रहेगा।”

उन्होंने आगे कहा कि धार्मिक भेदभाव एक व्यापक चुनौती है जो सभी धर्मों के अनुयायियों को प्रभावित करती है। हरीश ने धर्म संबंधी मुद्दों पर विचार-विमर्श के महत्व पर भी ज़ोर दिया। उन्होंने कहा कि इस तरह की चर्चाओं से लोगों को एकजुट होना चाहिए, न कि बांटना चाहिए। उन्होंने कहा, “ऐसे भविष्य के लिए काम करने की जरुरत है जहां प्रत्येक व्यक्ति, चाहे उसका धर्म कोई भी हो, सम्मान, सुरक्षा और गरिमा के साथ रह सके। धर्म के मुद्दों पर किसी भी विचार-विमर्श का उद्देश्य एकजुट करना होना चाहिए, न कि विभाजित करना।”

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