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‘लोग चुनाव जीतने के लिए क्या नहीं करते…’ चुनावी बॉन्ड को लेकर अब पूर्व चुनाव आयुक्त ने दी ये सलाह

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नई दिल्ली

पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) ओ.पी. रावत ने सोमवार को कहा कि चुनावी बॉन्ड में पारदर्शिता का अभाव बना हुआ है और चुनावी फंडिंग की इस योजना को दुरुस्त करने के लिए एक ‘स्वतंत्र निगरानीकर्ता’ (इंडिपेंडेंट वाचडॉग) की नियुक्ति की आवश्यकता है, जिसे सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून से बाहर रखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि आप इससे अंदाजा लगा लीजिए कि खेलों तक में लोग पदक जीतने के लिए स्टेरॉयड ले लेते हैं। यह तो ताज-ओ-तख्त की बात है। लोग सब कुछ करने की कोशिश करते हैं। वे हर प्रयास करते हैं, हर उपाय अपनाते हैं और हर हथकंडा आजमाते हैं।’ उन्होंने कहा कि निर्वाचन आयोग बतौर निगरानीकर्ता इन चुनौतियों का सामना करते हुए निष्पक्ष चुनाव कराता है।

चुनावी बॉन्ड में पारदर्शिता का अभाव
रावत ने एक इंटरव्यू में कहा कि चुनावी बॉन्ड का मामला फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में पेंडिंग है।शीर्ष अदालत ही इस बारे में आगे का रुख तय करेगी लेकिन उनके सुझाव के माध्यम से इस योजना को बेहतर बनाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि चुनावी बॉन्ड में अभी जो पारदर्शिता का अभाव है, इसे अगर दुरुस्त करना है तो इसका एक ही तरीका नजर आता है। कोई एक ऐसा स्वतंत्र वाचडॉग हो जो स्टेट बैंक ऑफ इंडिया से केवाईसी के रिकार्ड को देखकर यह प्रमाणित करे कि सभी चीजें योजना के प्रवाधानों के अनुरूप हो रही हैं।’ उन्होंने कहा कि यह निगरानीकर्ता यह भी सुनिश्चित करेगा कि चाहे वह सत्ताधारी पार्टी हो या कोई दूसरा दल, किसी को भी कोई अवांछित जानकारी उपलब्ध नहीं कराई जा रही है।

बॉन्ड पर चंदा देने वाले का नाम नहीं होता
जनवरी 2018 से एक दिसंबर 2018 तक देश के मुख्य निर्वाचन आयुक्त रहे रावत ने कहा कि उनके द्वारा प्रस्तावित ‘स्वतंत्र निगरानीकर्ता’ की संस्था की रचना और उसका स्वरूप सरकार तय कर सकती है। उन्होंने कहा कि बॉन्ड पर चंदा देने वाले का नाम नहीं होता और इसे गुप्त रखा जाता है, इसलिए आवश्यक यह है कि यह संस्था आरटीआई के दायरे से बाहर हो। उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार ने 2017-18 के बजट में चुनावी बॉन्ड शुरू करने के एलान के समय कहा था इससे देश के राजनीतिक दलों के चुनावी चंदे में पारदर्शिता आएगी।

मार्च 2018 में पहला चुनावी बॉन्ड जारी
सरकार ने मार्च 2018 में पहला चुनावी बॉन्ड जारी किया था। इस बॉण्ड के जरिए अपनी पसंद की पार्टी को चंदा दिया जा सकता है। इसमें व्यक्ति, कॉरपोरेट और संस्थाएं ये बॉन्ड खरीद सकते हैं और राजनीतिक पार्टियां इस बॉण्ड को बैंक में भुनाकर रकम हासिल करती हैं। बैंक चुनावी बॉन्ड उसी ग्राहक को बेचते हैं, जिनका केवाईसी सत्यापित होगा। रावत ने कहा कि चुनावी बॉन्ड को पांच साल हो रहे हैं और इस अवधि में किसी भी राजनीतिक दल से कोई चौंका देने जैसी शिकायत नहीं प्राप्त हुई है कि जिससे चिंता हो।

चुनावी चंदे में पारदर्शिता जरूरी
उन्होंने कहा कि यह जरूर है कि अभी पारदर्शिता का अभाव तो बना हुआ है, लेकिन चिंता की बात दिखी नहीं अभी। चुनावी चंदे में पारदर्शिता जरूरी है।’ उन्होंने कहा कि यह मामला फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में लंबित है, वही यह तय करेगा कि इस मुद्दे पर किस तरीके से आगे बढ़ना है। पूर्व निर्वाचन आयुक्त ने कहा कि निर्वाचन आयोग ने 2017 में ही चुनावी बॉन्ड को लेकर विरोध दर्ज कराया था और उस समय कहा था कि इस योजना से चुनाव अभियान के वित्तपोषण में पारदर्शिता का अभाव हो जाएगा।

चुनाव जीतने के लिए लोग सबकुछ करते हैं
उन्होंने कहा कि उस वक्त आयोग ने कहा था कि ऐसा होने से फर्जी कंपनियां भी इसमें दान कर सकती हैं और विदेशी धन भी आ सकता है। साथ ही कानून के विपरीत होने के बावजूद आयोग इसका कोई इलाज नहीं कर सकेगा। उन्होंने कहा कि चुनाव सुधार किसी भी लोकतंत्र के लिए एक सतत प्रक्रिया होनी चाहिए, क्योंकि हर चुनाव में राजनीतिक दल, उम्मीदवार और दूसरे हितधारक नयी-नयी चुनौतियां पेश करते रहते हैं।

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