नई दिल्ली,
लद्दाख के लोगों में गुस्सा है. लद्दाख के प्रतिनिधि दो बार केंद्र सरकार के साथ दो मीटिंग कर चुके हैं, लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला.लद्दाख के लोगों की पूर्ण राज्य और इसे संविधान के छठी अनुसूची में शामिल करने समेत कई मांगें हैं. बुधवार को लद्दाख में बंद बुलाया गया था. बताया जा रहा है कि लद्दाख के सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक भूख हड़ताल पर बैठ गए हैं. बुधवार से वो 21 दिन की भूख हड़ताल पर हैं.
मीडिया से बात करते हुए सोनम वांगचुक ने कहा, ‘रघुकुल रीत सदा चली आई, प्राण जाए पर वचन न जाए… ये सरकार दावा करती है कि राम उनके आदर्श हैं. राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं, जिन्होंने कभी वादा नहीं तोड़ा. इसलिए हम उम्मीद कर सकते हैं कि ये सरकार हमारे लोगों से किए वादों को नहीं तोड़ेगी.’
वांगचुक ने ये हड़ताल तब शुरू की, जब केंद्र के साथ दो बार की बातचीत बेनतीजा रही. सोमवार को ही अपेक्स बॉडी लेह (एबीएल) और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (केडीए) ने दिल्ली में गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात की थी. मुलाकात के बाद एबीएल और केडीए के प्रतिनिधियों ने दावा किया कि दो बार बातचीत के बाद भी मांगों को लेकर कोई बात आगे नहीं बढ़ी.
दूसरी ओर, गृह मंत्रालय ने बयान जारी कर बताया था कि लद्दाख को संवैधानिक सुरक्षा देने के तौर-तरीकों पर विचार किया जा रहा है. गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय की अगुवाई में एक हाईपावर कमिटी है, जो एबीएल और केडीए की मांगों पर विचार कर रही है.
क्या हैं मांगें?
- एबीएल और केडीए की लद्दाख को लेकर कई मांगें हैं. सबसे बड़ी मांग है कि लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची में शामिल किया जाए, ताकि उसे संवैधानिक सुरक्षा मिल सके. इसके साथ ही लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा दिया जाए.
- इसके पीछे तर्क है कि पहले अनुच्छेद 370 की वजह से लद्दाख को संवैधानिक सुरक्षा मिली थी, लेकिन अब ऐसा कुछ नहीं है.
- इसके अलावा एबीएल और केडीए ने लद्दाख में पब्लिक सर्विस कमिशन (पीएससी) का गठन करने की मांग भी की है, ताकि स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के मौके पैदा हो सकें. पहले यहां के लोग जम्मू-कश्मीर पीएससी में अप्लाई करते थे.
- लद्दाख में दो लोकसभा सीटों की मांग भी है. एक कारगिल और एक लेह में. अभी लद्दाख में सिर्फ एक ही लोकसभा सीट है. लद्दाख देश की सबसे बड़ी संसदीय सीट है. इसका कुल क्षेत्रफल 1.73 लाख वर्ग किलोमीटर से भी ज्यादा है
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इन मांगों से क्या होगा?
- लद्दाख के लोग और एक्टिविस्ट छठी अनुसूची लागू करने की मांग कर रहे हैं. छठी अनुसूची असम, त्रिपुरा जैसे पूर्वोत्तर राज्यों में लागू है.
- छठी अनुसूची में संविधान के अनुच्छेद 244(2) और अनुच्छेद 275(1) के तहत विशेष प्रावधान हैं. इसके चलते ही असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम में जनजाति क्षेत्रों का प्रशासन है. छठी अनुसूची के तहत, जनजातीय क्षेत्रों में स्वायत्त जिले बनाने का प्रावधान है.
- छठी अनुसूची स्वायत्त जिला परिषदों के गठन का प्रावधान करता है. जिला परिषदों में कुल 30 सदस्य होते हैं, जिनमें से 4 को राज्यपाल नियुक्त करते हैं. जिला परिषद की अनुमति से ही उद्योग लगा सकते हैं.
- स्वायत्त जिला परिषद गांवों में भी एक परिषद और कोर्ट बना सकते हैं, जो अनुसूचित जनजाति से जुड़े विवादों का निपटारा करती हैं. अगर किसी अपराध में मौत या 5 साल से ज्यादा की जेल की सजा का प्रावधान है, तो राज्यपाल इन परिषदों को ऐसे मामलों में मुकदमा चलाने की अनुमति भी दे सकते हैं.
- छठी अनुसूची इन स्वायत्त जिला परिषदों को लैंड रेवेन्यू जमा करने, टैक्स लगाने, कारोबार को रेगुलेट करने, खनिजों के खनन के लिए लाइसेंस या पट्टा जारी करने के साथ-साथ स्कूल, मार्केट और सड़कें बनाने का अधिकार भी देती है.
