नई दिल्ली
1971 की लड़ाई में पाकिस्तान दो टुकड़ों में बंट चुका था। उसकी सेना को भारत के आगे सरेंडर करना पड़ा। पाकिस्तान के हुक्मरानों को दुनिया के सामने शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा। इसके बाद कभी ऐसा न हो, पड़ोसी मुल्क ने अपनी पूरी ताकत भारत के खिलाफ युद्ध की तैयारी करने में लगा दी। कैसे भी करके परमाणु हथियार कार्यक्रम शुरू कर दिया गया, जबकि ये ऐसा वक्त था जब मुश्किल से 25 साल हो रहे युवा देश को अपने संस्थानों, वित्तीय ढांचे, तकनीक, अर्थव्यवस्था, शिक्षा, रोजगार पर ध्यान देना था। लेकिन तब के एक बयान से समझ लीजिए कि उस दौर के पाकिस्तान के प्रधानमंत्री की सोच क्या थी? तत्कालीन पीएम जुल्फिकार अली भुट्टो देश को एटमी पावर बनाने के लिए इतने आतुर थे कि उन्होंने यहां तक कह दिया था कि हमें भले ही घास या पत्तियां खानी पड़ें, हम भूखे रहें लेकिन हम परमाणु बम जरूर बनाएंगे। जबकि भारत से अलग होने के 10 साल के भीतर ही पाकिस्तान की हालत बिगड़ने लगी थी लेकिन भारत के खिलाफ नफरत ने पूरे मुल्क का बंटाधार कर दिया। आज पाकिस्तान डूब रहा है। उसने भारत की ताकत देखकर परमाणु बम तो बना लिया लेकिन और कुछ न सीख सका। आज बम तो पड़ा है लेकिन देश तड़प रहा है।
Video for the purpose of review and criticism only.
Ration pic.twitter.com/lZEQ07nF7D— Pak Un Fans (@fansofpakuntold) September 13, 2022
ऐसे में यह समझना भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि भारत से अगर पाकिस्तान ने कुछ सीखा होता तो मौजूदा हालात का कैसे सामना करता? प्राकृतिक आपदा कोई भी हो, सबसे जरूरी होता है उसे समय रहते पहचान लिया जाए क्योंकि उसके बाद ही बचाव और राहत के उपाय किए जा सकते हैं। चक्रवाती तूफान का ही उदाहरण लेते हैं। हर दशक में अपडेट होती तकनीक के साथ ही भारत ने खुद को सशक्त और आत्मनिर्भर बनाया है। देश में एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, कोस्टगार्ड और सेना की टीम तैयार की गई। तकनीक की मदद से पहले ही अलर्ट जारी करने का सिस्टम बना और संवेदनशील क्षेत्रों से लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाए जाने की रणनीति बनी।
I have never seen climate carnage on the scale of the floods here in Pakistan.
As our planet continues to warm, all countries will increasingly suffer losses and damage from climate beyond their capacity to adapt.
This is a global crisis. It demands a global response. pic.twitter.com/5nqcJIMoIA
— António Guterres (@antonioguterres) September 10, 2022
भारत की तैयारियों का असर क्या हुआ, इसे ऐसे समझिए ओडिशा में 1999 में आए तूफान में 10 हजार से ज्यादा लोगों की मौत हो गई थी। लेकिन पिछले साल आए चक्रवात यास से ज्यादा नुकसान नहीं हुआ। भारत ने साल दर साल आपदा नियंत्रण और जोखिम को न्यूनतम करने में शानदार उपलब्धि हासिल की है। ओडिशा और बंगाल में आए तूफान के पहुंचने से पहले ही बचाव एवं राहत अभियान शुरू कर दिया गया था।
पाकिस्तान के बुरे दिन
अब जरा पाकिस्तान की हालत देखिए। राजनीतिक अस्थिरता वाले देश में सेना और सरकार के बीच तनातनी चलती ही रहती है। अर्थव्यवस्था का हाल पहले से बुरा है। विदेशी मुद्रा भंडार खाली हो चुका है। आय का स्रोत नहीं है और उधार बढ़ता चला गया। पश्चिमी देशों की मदद पर पूरा देश चल रहा है। ऐसे माहौल में जब बाढ़ आई तो देश पूरी तरह से टूट गया। लोग बदहवास हो गए क्योंकि उन्हें बचाने वाला कोई नहीं था। बाढ़ ने देश में लाखों एकड़ खड़ी फसल, घर और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को तबाह कर दिया है। देश में खाद्यान्न संकट भी पैदा हो सकता है। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन को मदद के लिए आभार जताते हुए यह भी बताया कि बाढ़ से देश की GDP दो प्रतिशत घट सकती है।
मजबूर लोग बचे-खुचे मंदिर और मस्जिदों में शरण ले रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र और दुनिया के कई देशों से मदद पर लोगों को खाने-पीने का सामान पहुंचाया जा रहा है। अब तक बाढ़ में लगभग 1,400 लोग मारे गए हैं। देश का एक तिहाई हिस्सा जलमग्न है। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में देखा जा सकता है कि फसलें नष्ट हो गई हैं और तीन करोड़ 30 लाख से अधिक लोग विस्थापित हो गए हैं।
आंसू ला देगा यह वीडियो
ट्विटर पर एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसे देख किसी भी इंसान की आंखों में आंसू आ जाए। इसमें देखा जा सकता है कि ट्रक से खाने-पीने के सामान की बोरी बांटी गई और एक शख्स लेकर जाने लगा तो लोग उसे घेर लेते हैं और छीनने लगते हैं। वह सामान की बोरी को सीने से जकड़ लेता है, दो लोग उससे छीनने की कोशिश करते रहते हैं लेकिन वह जमीन पर बैठ जाता है और रोने लगता है। पाकिस्तान के मुश्किल हालात के एक नहीं, अनेक वीडियो हैं।
पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्र के प्रमुख ने हेलिकॉप्टर से बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया था। बाढ़ से खेत-खलिहान, गांव जलमग्न दिख रहे हैं। विदेश से मदद तो आ रही है लेकिन भ्रष्टाचार में लिप्त शासन-प्रशासन के चलते इसके जमीन पर कम पहुंचने की आशंका भी बनी रहती है।
