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यूक्रेन युद्ध, अमेरिकी प्रतिबंधों का डर, दोस्‍त रूस के हथियारों से क्‍या दूरी बना रहा भारत? समझें

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मॉस्को

भारत दुनिया में हथियारों का सबसे बड़ा आयातक है और नई दिल्ली की रक्षा जरूरतों का सबसे बड़ा हिस्सा रूस पूरा करता है। भारत के रक्षा शस्त्रागार में रूसी हथियारों की संख्या सबसे ज्यादा है। हालांकि, अब यह रूस के हथियारों पर अपनी निर्भरता कम कर रहा है और हाल में इससे किसी नई खरीद की संभावना नहीं है। पिछले दो दशक में भारत ने रूस से 60 अरब डॉलर के हथियार खरीदे हैं, लेकिन स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट यानी सिपरी (SIPRI) की नई रिपोर्ट बताता है कि आयात में लगातार गिरावट आ रही है। आखिर क्या वजह है कि भारत अपने पुराने दोस्त से हथियारों की खरीद कम कर रहा है।

सिपरी की रिपोर्ट के अनुसार, 2009 से 2013 के बीच भारत का रूस से रक्षा आयात 76 प्रतिशत से घटकर 36 प्रतिशत पर पहुंच गया। वहीं, पिछले पांच साल में रूसी रक्षा निर्यात भारत के हथियार आयात के आधे से भी कम था। 1960 के दशक के बाद से ऐसा पहली बार हुआ है। भारतीय रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यूक्रेन युद्ध के चलते इस गिरावट में और तेजी आएगी। पॉलिटिको पत्रिका ने एक्सपर्ट के हवाले से लिखा है कि पहले से खरीदे गए उपकरणों की सर्विस के लिए मॉस्को से स्पेयर पार्ट की खरीद जारी रहेगी, लेकिन निकट भविष्य में किसी बड़ी खरीद के लिए रूस पर विचार नहीं किया जा रहा है।

अमेरिका से रिश्ते हो रहे मजबूत
भारतीय रक्षा एक्सपर्ट का ये भी मानना है कि मॉस्को अब भारत की रक्षा जरूरतों को पूरा करने की स्थिति में नहीं है। इसका सीधा मतलब है कि पश्चिमी देश और वे कंपनियां जो भारतीय कंपनी या संगठनों के साथ टेक्नोलॉजी ट्रांसफर करने के लिए तैयार होती हैं, उन्हें इस मौके का फायदा हो सकता है। यूक्रेन की जंग में उलझने और रूस के हथियारों की गुणवत्ता पर भारत की चिंता के साथ ही रक्षा उद्योग में आत्मनिर्भर होने की नई दिल्ली की चाहत ने इस बदलाव में अहम भूमिका निभाई है। इसके साथ ही भारत और अमेरिका के रिश्ते बीते कुछ समय में मजबूत हुए हैं। ऐसे में रूस के साथ रक्षा खरीद बढ़ाकर अमेरिका को नाराज नहीं करना चाहता है।

यूक्रेन युद्ध बना रूस के लिए मुश्किल
रूस ने अपनी सारी क्षमता यूक्रेन युद्ध में झोंक रखी है और हाल फिलहाल इसके खत्म होने के संकेत नहीं दिख रहे हैं। युद्ध के चलते रूस की रक्षा जरूरतें कई गुना बढ़ गई हैं और यह भारत को पहले से तय सप्लाई भी नहीं दे पा रहा है। भारतीय सशस्त्र बलों के लिए एसाल्ट राइफलों के उत्पादन के लिए 2019 में स्थापित फैक्ट्री इंडो-रूसी राइफल्स प्राइवेट लिमिटेड अभी भी क्लाश्निकोव की डिलीवरी का इंतजार कर रही है। इसके साथ ही रूस को पांच एस-400 वायु रक्षा प्रणाली देनी हैं। इसमें भी अभी दो नहीं मिल पाई हैं। इसके साथ ही रूसी परमाणु पनडुब्बी को 2025 तक यहां आना था, लेकिन अब यह पट्टा खत्म हो सकता है। गोवा में दो रूसी और दो संयुक्त रूप से निर्मित होने वाले युद्धपोतों के मामले में भी कुछ नहीं हुआ है।

इसके अलावा भारत ने कुछ मिग 29K जैसे कुछ रूसी आयात की गुणवत्ता में कमी पाई है। यूक्रेन युद्ध के दौरान रूसी हथियारों के प्रदर्शन की वजह से भी इनके प्रति आकर्षण कम हुआ है। यूक्रेन ने अजेय कही जाने वाली रूसी मिसाइलों को मार गिराया है। यही नहीं, बिना नौसेना की मदद से वह रूसी जहाजों को भी निशाना बना रहा है। इसके साथ ही यूक्रेन ने जासूसी ए-50 और सुखोई जैसे लड़ाई विमानों को जिस तरह से मार गिराया है, उसने भारत की चिंताएं बढ़ाई हैं। भारत की वायु सेना लंबे समय से रूसी जेट पर निर्भर रही है लेकिन अब देश नए बहुद्देश्यीय लड़ाकू विमानों को खरीदने की योजना बना रहा है। फ्रांस से लिए गए राफेल इसका सीधा उदाहरण है। भारत अब रूसी जेट की तरफ विचार भी नहीं कर रहा है।

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