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संस्कृत का धर्म से लेना देना नहीं, राजभाषा बनाना चाहिए… पूर्व CJI ने कही ‘सेक्युलर’ वाली बात

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नई दिल्ली

आजकल संस्कृत भाषा को लेकर बातें कम होती हैं। बच्चे को एडमिशन दिलाते वक्त अभिभावक हिंदी-अंग्रेजी के अलावा एक विदेशी विषय चुन लेते हैं लेकिन संस्कृत से बचते हैं। उनके मन में एक सवाल रहता है कि फॉरेन लैंग्वेज पढ़ने से बच्चे को नौकरी मिलने में आसानी रहेगी। आजकल संस्कृत पढ़ने पर नौकरी मिलती कहां है? हालांकि सब ऐसा नहीं सोचते हैं। पूर्व चीफ जस्टिस शरद बोबडे का मानना है कि हिंदी के साथ-साथ संस्कृत भाषा को भारत की आधिकारिक भाषा बनाना चाहिए। वह इसकी वजह भी बताते हैं। हमारे सहयोगी अखबार TOI में उनका इंटरव्यू प्रकाशित हुआ है। वह बताते हैं कि वकील के बाद ट्रायल कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट के जज के तौर पर काम करते हुए उनका संस्कृत भाषा से लगाव बढ़ता गया।

संस्कृत को आधिकारिक भाषा बनाने का किसी धर्म से कोई लेना-देना नहीं है क्योंकि 95 प्रतिशत भाषा का किसी धर्म से नहीं बल्कि दर्शन, कानून, विज्ञान, साहित्य, शिल्पकला, खगोलशास्त्र आदि से लेना-देना है। मुझे नहीं लगता कि यह मुद्दा अनसुलझा रहना चाहिए। यह 1949 से अनसुलझा है।

2-3% भारतीय ही अंग्रेजी में तेज
बोबडे ने कहा, ‘मुझे ऐसा लगता है कि हिंदी के अलावा देश में एक ऐसी कॉमन लैंग्वेज की जरूरत है, जिसे पूरे देश में समझने वाले हों, शब्दावली हो। वैसे, अनाधिकारिक रूप से अंग्रेजी हमारी दूसरी आधिकारिक भाषा बन गई है। जबकि हाल का एक सर्वे बताता है कि मुश्किल से 2-3% भारतीय ही धाराप्रवाह अंग्रेजी बोल पाते हैं।’ जब पूर्व सीजेआई से पूछा गया कि क्या इसको लेकर कोई डिमांड की गई? बोबडे ने कहा कि उनसे कोर्ट में संस्कृत भाषा के इस्तेमाल के लिए कोई मांग तो नहीं की गई लेकिन देशभर के कई वकील संघों और कुछ जजों के समूह ने अपनी क्षेत्रीय भाषा में केस लिखने और फैसले का आग्रह किया था। महाराष्ट्र में पश्चिमी क्षेत्रों के लोगों ने मराठी में फैसले लिखने की अनुमति मांगी। मध्य प्रदेश में हिंदी का इस्तेमाल होता है। इसी तरह दक्षिण भारत की लोअर कोर्टों में स्थानीय भाषा को तवज्जो दी जाती है। भारत की आजादी के 75 साल बाद भी ऐसा देखा जाता है कि दक्षिण के राज्यों में हिंदी को स्वीकार नहीं किया गया।

तब आंबेडकर ने कही थी ये बात
संस्कृत को लेकर डॉ. भीमराव आंबेडकर ने भी महत्वपूर्ण बात कही थी। उन्होंने संस्कृत को राजभाषा के रूप में रखने का प्रस्ताव रखा था। पूर्व सीजेआई ने कहा कि आंबेडकर के प्रस्ताव को संविधान सभा के कई सदस्यों की सहमति मिली थी। बाद में उनके सुझाव को आर्टिकल 351 में शामिल किया गया। जब मीडिया ने आंबेडकर से उनके प्रस्ताव के बारे में पूछा था तो उन्होंने कहा कि इसमें गलत क्या है? उनके सवाल का जवाब आज तक नहीं मिला है।

धर्म से संस्कृत का लेना देना नहीं
आमतौर पर संस्कृत को धर्म से जोड़कर देखा जाता है क्योंकि धर्मग्रंथ और पूजा श्लोक संस्कृत में हैं। इस पर बोबडे ने कहा कि करीब 80-90 फीसदी संस्कृत के साहित्य का किसी भी धर्म या ईश्वर से लेना देना नहीं है। ऐसे में संस्कृत को राजभाषा बनाने का किसी भी धर्म से कोई कनेक्शन नहीं है। उन्होंने कहा कि मैं एक सेक्युलर लैंग्वेज को आम आदमी के इस्तेमाल का सुझाव दे रहा हूं क्योंकि संस्कृत को इंडो-यूरोपियन भाषाओं की जननी माना जाता है।आखिर में बोबडे कहते हैं कि सरकार को आर्टिकल 344 के तहत आधिकारिक भाषा पर संसदीय समिति या आयोग बनाना चाहिए।

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