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Wednesday, June 10, 2026
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कर्नाटक की जीत में कौन बने कांग्रेस के हीरो, किनकी वजह से बीजेपी की हुई करारी हार

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बेंगलुरु

कर्नाटक विधानसभा के चुनावी नतीजों में कांग्रेस पार्टी को बंपर जीत मिली है। जबकि दोबारा सत्ता में वापसी का दावा कर रही बीजेपी को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा है। चुनावी नतीजों में कांग्रेस की पूर्ण बहुमत वाली सरकार बन रही है। कर्नाटक की 224 सीटों वाली विधानसभा में जादुई आंकड़े के लिए 113 सीटों की जरूरत होती है। कांग्रेस ने 135 सीटों पर जीत हासिल की है तो वहीं बीजेपी को महज 66 सीटों से पराजय का सामना करना पड़ा। जबकि खुद को किंगमेकर बता रही देवेगौड़ा की पार्टी जेडीएस को महज 19 सीटें हाथ लगी हैं। कर्नाटक चुनाव के नतीजों से जहां कई राजनीतिक चेहरे निखरकर सामने आए। तो वहीं दूसरी ओर कई अपना करिश्मा दिखाने से चूक गए। कुछ कांग्रेस की ओर से जीत के शिल्पकार बने तो कुछ का बीजेपी की करारी हार के बाद सियासी ग्राफ गिर सकता है। आइए जान लेते हैं कौन हैं वो खास चेहरे…

जीत के हीरो
मल्लिकार्जुन खरगे: कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे का अध्यक्ष बनना कर्नाटक चुनाव में अहम साबित हुआ। उन्होंने अपने गृह राज्य में पार्टी को जिताने के लिए पूरी ताकत लगा दी। प्रदेश की जनता ने उन्हें निराश नहीं किया। खरगे के आने से कांग्रेस को दलितों के बीच पैठ बनाने में भरपूर मदद मिली, बल्कि पार्टी के भीतर उनकी पकड़ व कद बढ़ेगा।

सिद्धारमैया: प्रदेश की राजनीति में बड़ा चेहरा सिद्धारमैया पूर्व सीएम रह चुके हैं। फिलहाल वह नेता प्रतिपक्ष थे। इस जीत में जमीन पर उनकी पकड़ और उनकी इमेज की भूमिका भी अहम रही। अपना आखिरी चुनाव बताने वाले सिद्धारमैया प्रदेश के अगले सीएम की रेस के सबसे मजबूत दावेदार माने जा रहे हैं।

डी के शिवकुमार: आबादी के लिहाज से सूबे की दूसरे सबसे बड़े समुदाय वोक्कालिगा तबके से आने वाले शिवकुमार कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष हैं। उन्हें अपने संगठनीय अनुभवों, बेहतरीन मैनेजमेंट व रणनीतिकार के तौर पर जाना जाता है। डी के ने जिस तरह से वोक्कालिगा समुदाय और JDS के गढ़ मैसूर इलाके में पार्टी को जीत दिलाई, उससे न सिर्फ राजनीति में, बल्कि वोक्कालिगा समुदाय में उनकी पैठ का संकेत माना जा रहा है।

रणदीप सुरजेवाला: रणदीप सुरजेवाला कर्नाटक में कांग्रेस प्रभारी हैं। विधानसभा चुनाव को लेकर पार्टी जिस तरह से एक साल पहले ही चुनावी तैयारियों की शुरुआत की दी, उसके पीछे उन्हीं की सोच बताई जाती है। माना जा है कि इस जीत के बाद कांग्रेस के भीतर सुरजेवाला का कद और बढ़ेगा।

राहुल गांधी: इस जीत के बाद राहुल गांधी की इमेज और निखरकर आएगी। जिस तरह से उन्होंने तमाम अपने ऊपर हो रहे तमाम हमलों के बावजूद कर्नाटक में लगातार प्रचार किया। उसने लोगों के बीच राहुल की इमेज को और मजबूत किया। वहीं खरगे, अशोक गहलोत, भूपेश बघेल और सिद्धारमैया जैसे तमाम नेताओं ने इस जीत का श्रेय ‘भारत जोड़ो यात्रा’ को भी दिया है।

असर छोड़ने में नाकाम
येदियुरप्पा: प्रदेश की राजनीति का सबसे बड़ा चेहरा और पूर्व सीएम। लिंगायत वोटों पर उनकी पकड़ को देखते हुए बीजेपी ने उन्हें सीएम पद से भले ही हटाया हो, लेकिन चुनाव से ऐन पहले कैंपेन की कमान देकर भरपाई करने की कोशिश की। लेकिन यह कोशिश रंग नहीं ला पाई। येदियुरप्पा लिंगायतों को बीजेपी की ओर खींचने में नाकाम रहे।

बसवराज बोम्मई: प्रदेश के निवर्तमान सीएम। लिंगायत तबके से आने के बावजूद वह कोई खास कमाल नहीं दिखा सके। अपने एक साल से भी कम के कार्यकाल में वह बीजेपी पर लगे भ्रष्टाचार के दागों को धोने में नाकाम दिखे। चुनाव में जिस तरह से येदियुरप्पा और केंद्रीय नेतृत्व ने प्रचार की कमान संभाली, उसके चलते बोम्मई साइडलाइन होते दिखे।

बी. एल. संतोष: संघ के पृष्ठभूमि से आए प्रदेश में बीजेपी का एक अहम चेहरा। 8 साल तक प्रदेश बीजेपी में संगठन महामंत्री के तौर पर पार्टी को खड़ा करने में अहम भूमिका रही। संगठन के कामों का लंबा अनुभव। फिलहाल संगठन महामंत्री के पद पर। हिंदुत्व के कट्टर समर्थक संतोष इस चुनाव में खास प्रभाव छोड़ने में नाकाम रहे।

सी. टी. रवि: कर्नाटक बीजेपी के अहम चेहरों में से एक रवि बोम्मई सरकार में मंत्री और चार बार के विधायक। चुनाव में बीजेपी के प्रचार अभियान के अहम रणनीतिकारों में से एक। फिलहाल केंद्रीय बीजेपी में महामंत्री के तौर पर कई प्रदेशों का प्रभार देख रहे। चिकमंगलुरू सीट से हालिया चुनाव में रवि को हार का सामना करना पड़ा।

एच. डी. कुमारस्वामी: किंगमेकर माने जा रहे जेडीएस नेता एच डी कुमारस्वामी और उनकी पार्टी का प्रदर्शन काफी निराशाजनक ही रहा। भले ही कुमारस्वामी खुद चन्नापटना से जीतने में कामयाब रहे हों। लेकिन वह अपने बेटे और परिवार की अहम सीट रामनगरम बचाने में नाकाम रहे। पिछली बार की तुलना में उनकी पार्टी को वोट प्रतिशत 18 फीसदी से गिरकर 11 फीसदी और सीटें 37 से घटकर 19 रह गईं।

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