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Wednesday, April 1, 2026
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घोसी टेस्ट में फेल होने के बाद बैकफुट पर बीजेपी के साथी क्या करेंगे राजभर?

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लखनऊ

उत्तर प्रदेश का राजनीतिक पारा अचानक बढ़ गया है। घोसी विधानसभा उप चुनाव में समाजवादी पार्टी उम्मीदवार सुधाकर सिंह की जीत ने I.N.D.I.A. के उत्साह को बढ़ा दिया है। मैनपुरी लोकसभा उप चुनाव में जीत के बाद जिस प्रकार से समाजवादी पार्टी एक अलग ही रंग में दिख रही थी। कुछ उसी प्रकार उत्साह घोसी के चुनाव परिणाम के बाद देखा जा रहा है। वहीं, भारतीय जनता पार्टी के सहयोगियों की टेंशन बढ़ी हुई है। घोसी चुनाव को भाजपा के सहयोगियों ने प्रतिष्ठा का विषय बना लिया था। हाल ही में भाजपा से जुड़े ओम प्रकाश राजभर से लेकर योगी सरकार में सहयोगी निषाद पार्टी और अपना दल एस की चिंता बढ़ी है। इन लोगों ने जिस प्रकार से भाजपा को एक बड़े स्तर पर वोट ट्रांसफर का जो भरोसा दिलाया था, लिटमस टेस्ट में वे विफल रहे। घोसी के चुनाव परिणाम ने भाजपा के सहयोगियों को बैकफुट पर धकेल दिया है। चर्चा यह होने लगी है कि आखिर उन्हें क्या मिलेगा? लोकसभा चुनाव 2024 में सीटों के बंटवारे को लेकर भी कयासबाजियों का दौर शुरू हो गया है।

भाजपा कैंडिडेट को बड़ी हार ने बढ़ाई परेशानी
घोसी विधानसभा उप चुनाव में कांटे का मुकाबला नहीं, बल्कि एक-तरफा कॉन्टेस्ट था। सपा उम्मीदवार सुधाकर सिंह ने पहले राउंड के वोटों की गिनती से ही जो बढ़त बनाई, वह लगातार बढ़ती गई। किसी भी राउंड में भाजपा के दारा सिंह चौहान विपक्षी उम्मीदवार से आगे बढ़ते नहीं दिखाई दिए। ऐसे में भाजपा के सहयोगी दलों का दावा यहां फेल होता दिखा। इस बार के विधानसभा उप चुनाव में भाजपा अपनी बदली रणनीति के साथ चुनावी मैदान में थी। सीएम योगी आदित्यनाथ चुनाव प्रचार के आखिरी चरण में घोसी के रण में उतरे। इससे पहले भाजपा की सेकेंड लेवल लीडरशिप और सहयोगी दलों के नेताओं का जोर दिखा।

भाजपा अमूमन उप चुनावों के प्रचार अभियान की शुरुआत या मध्य चरण में सीएम योगी को चुनावी मैदान में उतारती रही है। सीएम योगी चुनावी मैदान में उतर कर एक टेंपो सेट करते रहे हैं। अन्य नेता उसको आगे बढ़ाते दिखे। इस बार बदली रणनीति का फायदा भाजपा को नहीं मिला।

सपा ने सेट किया चुनावी टोन
घोसी उप चुनाव में समाजवादी पार्टी भाजपा की रणनीति पर आगे बढ़ती दिखी। चुनाव प्रचार अभियान के शुरुआती चरण से ही पार्टी की सेकेंड लेवल लीडरशिप छोटी-छोटी सभाओं के जरिए माहौल बनाती रही। वहीं, टॉप लीडर्स शिवपाल यादव, प्रो. रामगोपाल यादव और स्वामी प्रसाद मौर्य चुनावी सभाओं के जरिए माहौल में अलग रंग देते दिखे। चुनाव प्रचार अभियान के बीच में सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने उतर एक टोन सेट किया और वह सुधाकर सिंह की जीत का आधार बना। भाजपा की रणनीति भी इसके आगे कोई खास प्रभाव नहीं डाल पाई। परंपरागत सवर्ण वोट बैंक में बिखराव इसका संदेश दे रहा है।

सपा की रणनीति के आगे राजभर वोट बैंक पर दावा करने वाले ओम प्रकाश राजभर और निषाद जाति के वोट बैंक पर हक जमाने वाले डॉ. संजय निषाद भी फीके पड़ गए। अपना दल एस की अनुप्रिया पटेल- आशीष पटेल भी इस चुनाव में निष्प्रभावी ही रहे। भाजपा का वोट प्रतिशत बढ़ा जरूर, लेकिन सपा के वोट प्रतिशत में आए उछाल ने दारा सिंह चौहान को विधानसभा तक की दौर से आउट कर दिया।

सहयोगियों का होगा क्या?
सवाल यहां सबसे बड़ा यह है कि एनडीए के सहयोगियों का होगा क्या? दरअसल, लोकसभा चुनाव 2024 को लेकर अपना दल एस 2 से बढ़कर तीन से चार सीटों की मांग तक जाने की तैयारी में थी। वहीं, ओम प्रकाश राजभर ने एनडीए का साथ देने के बाद से ही अलग संकेत देने शुरू कर दिए हैं। माना जा रहा था कि सुभासपा लोकसभा चुनाव को लेकर कम से कम 3 सीटों की मांग कर सकती है। निषाद पार्टी की भी दावेदारी दो से तीन सीटों की रही है। घोसी चुनाव के रिजल्ट ने भाजपा के सहयोगियों की डिमांड पर लगाम लगाने का संकेत दे दिया है।

माना जा रहा है कि भाजपा की ओर से सहयोगियों को जो सीटें ऑफर होंगी, उसे स्वीकार करना ही उनकी मजबूरी होगी। वैसे भी अपना दल एस पिछले दो लोकसभा चुनावों में 2 सीटों पर दावा कर उसे जीतने में कामयाब रही है। इस बार भी वे इतनी ही सीटों पर मान सकते हैं। सबसे अधिक नजर सुभासपा और निषाद पार्टी पर होगी।

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