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1000 साल पुराने सिक्के, 94 मूर्तियां, संस्कृत-प्राकृत के शिलालेख… धार भोजशाला परिसर की ASI सर्वे रिपोर्ट में बड़े खुलासे

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धार:

धार नगरी की ऐतिहासिक भोजशाला के सर्वेक्षण के बाद ASI ने अपनी सर्वे रिपोर्ट में कहा कि परिसर से चांदी, तांबे, एल्यूमीनियम और स्टील के कुल 31 सिक्के बीते दिनों पाए गए थे. ये सिक्के इंडो-ससैनियन (10वीं-11वीं सदी), दिल्ली सल्तनत (13वीं-14वीं सदी), मालवा सुल्तान (15वीं-16वीं सदी), मुगल (15वीं-16वीं सदी) के काल के हैं. ये सिक्के 18वीं शताब्दी में धार राज्य में वर्तमान संरचना में पाए गए थे. साइट पर पाए गए सबसे पुराने सिक्के इंडो-सासैनियन हैं. ये सिक्के 10वीं-11वीं शताब्दी के हो सकते हैं.

खिड़कियों और खंभों पर उकेरी गई थी देवी-देवताओं और पुशओं की आकृतियां
साथ ही यह भी दावा किया गया है कि ये सिक्के तब के हैं, जब परमार राजा धार में अपनी राजधानी के साथ मालवा में शासन कर रहे थे. जांच के दौरान कुल 94 मूर्तियां, मूर्तिकला के टुकड़े और मूर्तिकला चित्रण के साथ वास्तुशिल्प सदस्य देखे गए. वे बेसाल्ट, संगमरमर, शिस्ट, नरम पत्थर, बलुआ पत्थर और चूना पत्थर से बने हैं. खिड़कियों, खंभों और प्रयुक्त बीमों पर चार सशस्त्र देवताओं की मूर्तियां उकेरी गई थीं. इन पर उकेरी गई छवियों में गणेश, ब्रह्मा अपनी पत्नियों के साथ, नृसिंह, भैरव, देवी-देवता, मानव और पशु आकृतियां शामिल हैं.

घर पर उकेरी गई छवियों में शेर, हाथी, घोड़ा, कुत्ता, बंदर, सांप, कछुआ, हंस जैसे अन्य पक्षी भी थे. इसमें पौराणिक और मिश्रित आकृतियों में विभिन्न प्रकार के कीर्तिमुख मानव चेहरा, सिंह चेहरा, मिश्रित चेहरा भी शामिल है. जानकारी के मुताबिक कई स्थानों पर मस्जिदों में मानव और जानवरों की आकृतियों की अनुमति नहीं है, इसलिए ऐसी छवियों को तराशा गया है या विकृत कर दिया गया है.

इस तरह के प्रयास पश्चिमी और पूर्वी स्तंभों में स्तंभों और भित्तिस्तंभों पर देखे जा सकते हैं. पश्चिमी उपनिवेश में लिंटेल पर दक्षिण-पूर्व कक्ष का प्रवेश द्वार है. ऐसे में पश्चिमी स्तंभों में कई स्तंभों पर उकेरे गए मानव, पशु और मिश्रित चेहरों वाले कीर्तिमुख को नष्ट नहीं किया गया था. पश्चिमी स्तंभ की उत्तर और दक्षिण की दीवारों में लगी खिड़कियों के फ्रेम पर उकेरी गई देवताओं की छोटी आकृतियां भी तुलनात्मक रूप से अच्छी स्थिति में हैं.

शिलालेख एक शिक्षा केंद्र के अस्तित्व की परंपरा की ओर भी करते हैं संकेत
जानकारी के मुताबिक वर्तमान संरचना में और उसके आस-पास पाए गए कई टुकड़ों में समान पाठ शामिल है. इनमें सैकड़ों की संख्या में पद्य संख्याएं हैं. जिससे पता चलता है ही कि ये लंबी साहित्यिक रचनाएं थीं. पश्चिमी स्तंभ में दो अलग-अलग स्तंभों पर उत्कीर्ण दो नागकामिका शिलालेख व्याकरणिक और शैक्षिक रुचि के हैं. ये दो शिलालेख एक शिक्षा केंद्र के अस्तित्व की परंपरा की ओर संकेत करते हैं.

जिसके बारे में माना जाता है कि इसकी स्थापना राजा भोज ने की थी. एक शिलालेख के शुरुआती छंदों में परमार वंश के उदयादित्य के पुत्र राजा नरवर्मन 1094-1133 ई. के बीच शासन किया था. जानकारी के मुताबिक सभी संस्कृत और प्राकृत शिलालेख अरबी और फारसी शिलालेखों से पहले के हैं. जो यह दर्शाता है कि संस्कृत और प्राकृत शिलालेखों के उपयोगकर्ताओं या उत्कीर्णकों ने पहले इस स्थान पर कब्जा कर लिया था.

अब्दुल्ला शाह ने मूर्तियों को कर दिया था नष्ट
वहीं, खिलजी राजा महमूद शाह के शिलालेख के छंद 17-18, जो एएच 859 (1455 ई.पू.) का है और धार में अब्दुल्ला शाह चांगल के मकबरे के प्रवेश द्वार पर लगा हुआ है. यह वीर व्यक्ति धर्म के केंद्र से इस पुराने मठ में लोगों की भीड़ के साथ पहुंचा. जिसने हिंसक तरीके से मूर्तियों के पुतलों को नष्ट कर दिया और इस मंदिर को मस्जिद में बदल दिया. स्वभाव एवं आयु प्राप्त वास्तुशिल्प अवशेष, मूर्तिकला के टुकड़े, साहित्यिक ग्रंथों वाले शिलालेखों के बड़े स्लैब, स्तंभों पर नागकर्णिका शिलालेख आदि से पता चलता है कि साइट पर साहित्यिक और शैक्षिक गतिविधियों से जुड़ी एक बड़ी संरचना मौजूद थी.

वैज्ञानिक जांच और जांच के दौरान बरामद पुरातात्विक अवशेषों के आधार पर इस पहले से मौजूद संरचना को परमार काल का बताया जा सकता है. प्राप्त खोजों के अध्ययन और विश्लेषण, स्थापत्य अवशेषों, मूर्तियों और शिलालेखों, कला और मूर्तियों के अध्ययन से यह कहा जा सकता है कि मौजूदा संरचना पहले के मंदिरों के हिस्सों से बनाई गई थी. मध्यप्रदेश भोजशाला मामला हिंदू पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट से जल्द सुनवाई की मांग की है.

हिंदू समुदाय भोजशाला को देवी वाग्देवी माता सरस्वती का मंदिर मानता है। वहीं दूसरे समुदाय का कहना है कि मुस्लिमों की कमाल मौलाना मस्जिद यहां हैं। एचएफजे की याचिका पर उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ ने ज्ञानवापी की तर्ज पर भोजशाला का सर्वे कराने के आदेश दिए थे। जिस पर एएसआई ने 22 मार्च को सर्वेक्षण शुरू किया और चार सप्ताह के विस्तार सहित 98 दिनों तक जारी रहा। सर्वेक्षण बिना रुके चला, यहां तक कि सार्वजनिक अवकाश के दिन भी नहीं रुका। हैदराबाद स्थित राष्ट्रीय भूभौतिकीय अनुसंधान संस्थान एनजीआरआई ने ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम जीपीएस तथा ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार जीपीआर जांच की अतिरिक्त महानिदेशक डॉ. आलोक त्रिपाठी के निर्देशन में सर्वे में 1700 से ज्यादा पुरावशेष मिले है।

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