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Tuesday, June 9, 2026
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चीन में भी तांडव कर रही थी कोचिंग इंडस्ट्री, शी ने रातोंरात हेकड़ी निकाल दी! क्या मोदी करना चाहेंगे?

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चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने 2021 में रातोंरात ट्यूशन और कोचिंग इंडस्ट्री को ध्वस्त कर दिया था। क्यों और कैसे? इसका जवाब जानने से पहले एक महत्वपूर्ण सवाल- क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार कैंसर का रूप ले चुकी कोचिंग इंडस्ट्री का ऐसा ही ऑपरेशन नहीं कर सकती है ताकि सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था की जान में जान नहीं लौटा पाए? राजधानी दिल्ली के राजेंद्र नगर स्थित यूपीएससी की तैयारी कराने वाले एक कोचिंग संस्थान में तीन स्टूडेंट्स की मौतों से कई गंभीर सवाल फिर सिर उठा चुके हैं। सोचिए, हमारी सरकारें और शासन-प्रशासन कितने पाखंडी हैं जो युवा को देश का भविष्य बताते हैं, लेकिन ऐसी व्यवस्था बनाते हैं कि युवाओं को अपना भविष्य बनाने में अमानवीय दुर्गति झेलनी पड़ती है। शिक्षा देने में परिवारें बदहाल हो जाती हैं, उन्हें पुश्तैनी जमीनें तक बेचनी पड़ती हैं। दूसरी तरफ, ट्यूशन और कोचिंग सेंटर्स कमाई करके दिन-ब-दिन तगड़े होते जाते हैं।

शिक्षा में सुपरस्टार कल्चर!
कई कोचिंग सेंटर के मालिक और ‘सुपरस्टार’ शिक्षक मीडिया पर अपनी संवेदना व्यक्त कर रहे हैं, लेकिन क्या सच में वही दोषी नहीं हैं? सवाल है कि जब वे छात्रों से इतनी मोटी फीस लेते हैं या इंस्टाग्राम रील्स से इतनी प्रसिद्धि कमाते हैं, तो वे असुरक्षित और गंदी जगहों पर ‘क्लास’ क्यों चलाते हैं? जब वे छात्रों से 99.8 प्रतिशत फेल होने वाली परीक्षा को पास कराने का वादा करते हैं और मोटी फीस वसूलते हैं, तो वे बुनियादी सुविधाओं और सुरक्षा पर खर्च क्यों नहीं करते?

विद्यार्थियों का खून पीकर तगड़ी हो रही कोचिंग इंडस्ट्री
कोचिंग व्यवसाय कितना बड़ा है और कितनी तेजी से बढ़ रहा है, इसका अंदाजा जीएसटी कलेक्शन से लगाया जा सकता है। केंद्र सरकार को 2019-2020 में 18 प्रतिशत की दर से 2,240 करोड़ रुपये की जीएसटी मिली थी। पांच साल बाद यह रकम लगभग 150 प्रतिशत बढ़कर 5,517 करोड़ रुपये हो गई है। अनुमान है कि 2029 तक यह बढ़कर लगभग 15,000 करोड़ रुपये हो जाएगी।

इस व्यवसाय के आकार और शक्ति को समझना है तो देश के बड़े दैनिक समाचार पत्रों के पहले पन्ने पर नजर डालें। ये कोचिंग सेंटर अपने ‘सफल’ छात्रों के साथ-साथ अपने ‘शिक्षकों’ का विज्ञापन करने के लिए अखबारों में जगह खरीदते हैं। प्रत्येक शिक्षक को एक स्टार के रूप में पेश किया जाता है और हर किसी के नाम के पीछे ‘सर’ लगा होता है या कभी-कभार किसी महिला टीचर के नाम के पीछे ‘मैम’।

बेशर्म सरकारें और सार्वजनिक शिक्षा की बदहाली
यह फिल्म इंडस्ट्री के बाहर देश का सबसे बड़ा पर्सनल ब्रांड निर्माण का अभियान है क्योंकि कोचिंग बिजनस की सफलता के लिए संस्थापकों और शिक्षकों का सुपरस्टारडम बहुत जरूरी है। पहले शिक्षक विनम्र, उदार और बड़े दिल वाले लोग होते थे जो छात्रों को ज्ञान देते थे। कोचिंग व्यवसाय शिक्षा व्यवस्था पर एक धब्बा है। कोचिंग इंडस्ट्री में सुपरस्टार शिक्षकों का चलन दो बातों का प्रतीक है- पहला कि यह वास्तविक, गुमनाम, कम वेतन वाले शिक्षकों का अपमान है और दूसरा कि यह हमें याद दिलाता है कि हमारी सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था कितनी कमजोर है।

अगर हमारी शिक्षा व्यवस्था ठीक होती तो लाखों युवा ‘कोचिंग’ के लिए शहरों में क्यों घूमते रहे होते? निश्चित रूप से इनमें से कई चयनित छात्र इन विज्ञापनों में अपने चेहरे दिखाएंगे, कुछ को इसके लिए पैसे दिए जाएंगे और इस तरह वे अपने पवित्र करियर की शुरुआत एक तरह के ‘रिश्वत’ से करेंगे। कोचिंग बिजनस का आकार इसलिए तेजी से बढ़ रहा है क्योंकि हमारी सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था चरमरा गई है।

कोचिंग इंडस्ट्री की हैवानियत से कैसे पार पाया चीन?
अंग्रेजी न्यू वेबसाइट द प्रिंट के एक लेख में कहा गया है कि चीन में भी ऐसा ही हुआ। अभी तीन साल पहले 2021 में राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने मन बनाया। उन्होंने रातोंरात अपने पूरे ट्यूशन और कोचिंग उद्योग के शटर गिरा दिए। उन्होंने कहा कि कोचिंग इंडस्ट्री परिवारों की आर्थिक स्थिति बिगाड़ रही थी, असमानता पैदा कर रही थी, परिवारों का समय बर्बाद कर रही थी और पढ़ाई के नाम पर युवाओं की जिंदगी निरस बना रही थी। यूपीएससी के समकक्ष चीन में गाओकाओ है। इसके लिए कोचिंग सेंटर सहित सब कुछ प्रतिबंधित कर दिया गया है। अब मुनाफा कमाने के लिए पढ़ाई का कोई इंस्टिट्यूट नहीं खोला जा सकता है, ऐसे किसी इंस्टिट्यूट की शेयर बाजार में लिस्टिंग नहीं हो सकती है, किसी इंस्टिट्यूट का दूसरे में विलय या अधिग्रहण नहीं होगा, किसी की फ्रैंचाइजी नहीं खुलेगी, किसी को विदेशी फंडिंग नहीं होगी।

इतना ही नहीं, ऑनलाइन शिक्षा की सीमा भी तय कर दी गई। इन कदमों से रातोंरात चीनी एडटेक कंपनियों को शेयर बाजारों में 1 लाख करोड़ डॉलर से ज्यादा का नुकसान हुआ। यह 2008 की वैश्विक वित्तीय मंदी से कहीं अधिक का झटका था। तीन शीर्ष अरबपतियों, लैरी चेन, माइकल यू और झांग बैंगक्सिन ने अपनी संपत्ति का 50 से 90 प्रतिशत के बीच हिस्सा खो दिया। लेकिन शी ने व्यवसायियों की नहीं, विद्यार्थियों की चिंता की। क्या मोदी करेंगे?

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