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वैध धार्मिक प्रथाएं काला जादू कानून नहीं… गुजरात के धर्मगुरु पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने नहीं बदला फैसला, जानें मामला

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मुंबई

बॉम्बे हाईकोर्ट ने ने एक स्वयंभू धर्मगुरु को आपराधिक मामले से मुक्त करने के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि महाराष्ट्र के ‘काला जादू अधिनियम’ का उद्देश्य हानिकारक प्रथाओं पर अंकुश लगाना है, लेकिन यह ‘वैध धार्मिक प्रथाओं’ पर रोक नहीं लगाता। अपने उपदेशों के माध्यम से काले जादू को बढ़ावा देने के आरोपी गुजरात के रमेश मोदक उर्फ शिवकृपानंद स्वामी को निचली अदालत ने बरी कर दिया था। इसके बाद शिकायतकर्ता ने इस फैसले को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। बॉम्बे हाईकोर्ट की यह टिप्पणी इसलिए अहम है क्योंकि गुजरात सरकार ने महाराष्ट्र की तरह की राज्य में एक अंधश्रद्धा और ढोंगी बाबाओं पर शिकंजा कसने के लिए कानून पास किया है। महाराष्ट्र में यह कानून पहले से है।

कोर्ट ने बरकरार रखा फैसला
न्यायमूर्ति आर. एन. लड्ढा ने दो अप्रैल को निचली अदालत के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया और कहा कि सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद यह आदेश पारित किया गया था। हाईकोर्ट ने कहा कि महाराष्ट्र मानव बलि एवं अन्य अमानवीय, दुष्ट एवं अघोरी प्रथाओं और काला जादू निवारण एवं उन्मूलन अधिनियम, 2013 का उद्देश्य हानिकारक प्रथाओं पर अंकुश लगाना है, लेकिन यह वैध धार्मिक शिक्षाओं पर लागू नहीं होता।

धोखा देने का लगाया था आरोप
बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि शिकायतकर्ता ने स्वेच्छा से उन सेमिनार में भाग लिया था, जहां कथित तौर पर आरोपी की सीडी चलाई गई थी। अदालत ने कहा कि यह निर्विवाद तथ्य है कि मोदक ने इन सेमिनार का आयोजन नहीं किया था। पुणे के निवासी रोहन कुलकर्णी ने 2014 में अपनी शिकायत में मोदक और उनके सहयोगी नरेंद्र पाटिल पर आध्यात्मिक मार्गदर्शन एवं करियर में सफलता का झूठा वादा करके कार्यशालाओं के माध्यम से उन्हें धोखा देने का आरोप लगाया था। निचली अदालत ने 2020 में मोदक को मामले से बरी करते हुए कहा था कि अधिनियम के तहत उन पर लगे आरोप सही नहीं हैं।

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