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चीन ने भेजा ‘चाणक्‍य’, ऐक्‍शन में भारत-अमेरिका, जानें कैसे महाशक्तियों के बीच अखाड़ा बना नेपाल

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काठमांडू

नेपाल में आम चुनाव से ठीक पहले राजनीतिक गतिविधियों के साथ-साथ विदेशी गतिविधियां तेज हो गई हैं। शेर बहादुर देउबा के राज में नेपाल में भारत और अमेरिका के बढ़ते प्रभाव से टेंशन में आए चीन ने अपने ‘चाणक्‍य’ ली झांशू को 12 सितंबर को तीन दिवसीय दौरे पर काठमांडू भेजा। माना जा रहा है कि चीन के तीसरे सबसे बड़े नेता ने नेपाल के वामपंथी दलों के बीच सुलह कराने की कोशिश की है। ली झांसू नेपाल के इस अहम दोरे पर ऐसे समय पर आए हैं जब अमेरिका भी इस हिमालयी राज्‍य में अपने प्रभाव को काफी बढ़ा रहा है। चीन के भारी विरोध के बाद भी नेपाल की संसद ने अमेरिका की एमसीसी सहायता को अपनी मंजूरी दे दी।

इससे ड्रैगन को करारा झटका लगा है। अब चीन की कोशिश है कि किसी भी तरह से पड़ोसी देश नेपाल को अपने पाले में बनाए रखा जाए। दरअसल, कई विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका का एमसीसी प्रॉजेक्‍ट नेपाल में चीन के बढ़ते प्रभाव को कम करने की रणनीति है। उधर, भारत भी देउबा सरकार के कार्यकाल में नेपाल के साथ अपने रिश्‍ते को नई मजबूती दे रहा है। भारत ने नेपाल के साथ कई समझौतों पर हस्‍ताक्षर किया है। भारत पनबिजली परियोजना को बनाएगा जिसे चीन ने छोड़ दिया था। भारत ने अपने दो बंदरगाहों को नेपाल के लिए खोल दिया है।

नेपाल में चीन बनाम की अमेरिका जंग
नेपाल की राजनीति में अमेरिका और भारत की वापसी से टेंशन में आए चीन ने ली झांसू जैसे बड़े नेता को काठमांडू भेजा है। ली झांसू ने नेपाल में चीन की कर्ज का जाल कहे जाने वाली बीआरआई परियोजना से जुड़े 6 एमओयू पर हस्‍ताक्षर किया है। चीन चाहता है कि नेपाल उसकी ‘एक चीन’ नीति पर कायम रहे ताकि उसे तिब्‍बत में मुश्किलों का सामना नहीं करना पड़े। चीन के राष्‍ट्रपति शी जिनपिंग की साल 2019 में हुई यात्रा के बाद ली झांसू के दौरे को सबसे अहम माना जा रहा है।

चीनी नेता की इस काठमांडू यात्रा के पीछे अमेरिका की एक और योजना भी बड़ी वजह मानी जा रही है। अमेरिका चाहता है कि नेपाल उसके स्‍टेट पार्टनरशिप प्रोग्राम पर हस्‍ताक्षर करे। इस एसपीपी कार्यक्रम के जरिए ही अमेरिका किसी आपदा के आने पर अपने सैनिकों को मदद के लिए भेजता है। उधर, चीन इसे अमेरिका की हिंद प्रशांत नीति से नजदीकी रूप से जोड़ता है और सैन्‍य तथा सुरक्षा पहल मानता है। चीन को डर है कि इस संधि के जरिए अमेरिका उसके पड़ोसी देश नेपाल में एक सैन्‍य अड्डा बना सकता है। उधर, अमेरिका का तर्क है कि यह एसपीपी प्रोग्राम पिछले 25 साल से 90 देशों में चल रहा है।

ड्रैगन को कड़ी टक्‍कर दे रहा है भारत
अमेरिका ने साफ तौर पर कहा है कि यह एक सैन्‍य संगठन नहीं है। चीन‍ियों का मानना है कि अमेरिका नेपाल और चीन के बीच मतभेद करना चाहता है। चीन जहां क्षेत्रीय भूराजनीतिक प्रतिस्‍पर्द्धा पर अपनी नजरें गड़ाए हुए है, वहीं नेपाल चाहता है कि उसके उत्‍तरी पड़ोसी देश के साथ आपसी संपर्क बढ़े और व्‍यापार को बढ़ावा मिले। नेपाल की इच्‍छा है कि चीन ट्रेन चलाने में मदद करे और वित्‍तीय मदद करे। हालांकि इससे नेपाल के श्रीलंका की तरह से कर्ज के जाल में फंसने का डर सता रहा है।

उधर, चीन की कोशिश है कि नेपाल को रेल प्रॉजेक्‍ट में मदद करके उसकी भारत पर से निर्भरता को कम कर दी जाए। नेपाल को अमेरिका की हिंद प्रशांत रणनीति से दूर रखने के लिए चीन अब नेपाली नेताओं के साथ रिश्‍ते मजबूत कर रहा है और लोगों के बीच संबंधों को बढ़ा रहा है। चीन की इस चाल से भारत भी सजग है और नेपाल के साथ अपने रिश्‍ते को मजबूत कर रहा है। पीएम मोदी नेपाल की यात्रा पर गए थे और नेपाल के विदेश सचिव अभी भारत आए हैं।

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