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तेल-गैस का अथाह साम्राज्‍य और सुप्रीम लीडर का समर्थन… ईरानी सेना कैसे बनी देश की सबसे ताकतवर संस्था, चीन कनेक्शन भी जानें

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तेहरान:

ईरान की इजरायल और अमेरिका से बीते कुछ समय से लगातार तनातनी चल रही है। इस तनाव में ईरान की ओर से इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ही इजरायल और अमेरिका से टकराता दिख रहा है। IRGC मौजूदा समय में ईरान की सबसे ताकतवर संस्था है। ये संस्था बीते कुछ दशकों में ईरान की ना सिर्फ सबसे मजबूत सैन्य ताकत बन गई है बल्कि राजनीति में भी इसका सीधा दखल है। IRGC आर्थिक तौर पर भी बेहद मजबूत है। इसकी वजह इस संस्था का तेल और गैस के भंडार पर कब्जा हो जाना है। इजरायली वेबसाइट यरूशलम पोस्ट ने अपनी रिपोर्ट में IRGC के बारे में ऐसे कई दावे किए हैं।

यरूशलम पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान में साल 1979 में IRGC का गठन हुआ। आज के समय में यह देश की सबसे बड़ी सैन्य, आर्थिक और राजनीतिक ताकत बन चुकी है। IRGC का असर ईरान के हर क्षेत्र पर दिखता है। तेल उद्योग में IRGC की पकड़ उसके लिए बेहद फायदेमंद साबित हुई है। इससे IRGC ने खुद को एक समानांतर सरकार की तरह खड़ा कर लिया है। IRGC की अपनी अर्थव्यवस्था, विचारधारा और वैश्विक महत्वाकांक्षाएं हैं। सबसे खास बात ये है कि IRGC को सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई का समर्थन मिल रहा है।

तेल से बारी मुनाफा कमा रही IRGC
रिपोर्ट कहती है कि IRGC को ईरान के तेल से बड़ा मुनाफा मिलता है। इस साल तो यह मुनाफा और भी बढ़ गया है। ईरान सरकार ने IRGC को तेल का इस्तेमाल परमाणु कार्यक्रम जैसे कामों के लिए करने की इजाजत दी है। जानकारों का मानना है कि ईरान के 50 फीसदी तेल निर्यात पर IRGC का नियंत्रण है। इतना ही नहीं सरकार ने IRGC से जुड़ी संस्थाओं को सरकारी कर्ज चुकाने के लिए सरकारी संपत्ति का इस्तेमाल करने की इजाजत भी दी है।

ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान सरकार 2025 तक रोजाना 18.5 लाख बैरल तेल का निर्यात करेगी। इसमें से एक तिहाई यानी 12.4 अरब डॉलर सीधे सेना और उनके खास सैन्य परियोजनाओं को दिया जाएगा। यह बीते साल 2024 के मुकाबले तीन गुना ज्यादा है। इसके अलावा बाकी तेल (और सारी गैस) सरकार, राष्ट्रीय विकास कोष और राष्ट्रीय ईरानी तेल कंपनी के बीच बांटा जाएगा।

1980 के दशक में बढ़ी ताकत
IRGC की आर्थिक ताकत 1980 के दशक में ईरान-इराक युद्ध के बाद तेजी से बढ़ी, जब उसे युद्ध से तबाह हुए देश को फिर से खड़ा करने का काम सौंपा गया। इस दौरान IRGC ने बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट, बंदरगाह, टेलीकॉम कॉन्ट्रैक्ट और तेल-गैस के कुओं पर कब्जा कर लिया। इसके बाद 2000 के दशक में राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद ने IRGC से जुड़ी कंपनियों को तेल और गैस के कई कॉन्ट्रैक्ट दे दिए। इसने इसकी ताकत को और बढ़ा दिया।

चीन की मदद भी IRGC के लिए महत्वपूर्ण जीवन रेखा है। अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के बावजूद चीन रोजाना लाखों बैरल ईरानी तेल खरीदता है। ईरान का 80% तेल निर्यात चीन को होती है। यह तेल IRGC से जुड़ी कंपनियों के जरिए भेजा जाता है। इससे सीधेतौर IRGC के पास बड़ी रकम पहुंच जाती है। ऐसे में कहा जाता है की IRGC के लिए चीन एक लाइफलाइन लाइन की तरह बना हुआ है।

IRGC का काला साम्राज्य
इस सबके बीच IRGC पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगते रहे हैं। दरअसल IRGC ने ईरान के बजट से अलग एक साम्राज्य खड़ा कर लिया है। इससे एक ‘ब्लैक इकॉनमी’ तैयार गई है। इसमें बिना किसी जवाबदेही के IRGC देश की संपत्ति से मुनाफा कमा रहा है। IRGC लगातार ईरान की संपत्ति को इस्तेमाल अपनी ताकत बनाए रखने के लिए कर रही है।

 

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