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Thursday, April 30, 2026
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चंद्रयान-3 ने आखिरी पड़ाव भी किया पार, मून के लास्ट ऑर्बिट में हुई एंट्री, अब सिर्फ इतना बचा सफर

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नई दिल्ली

चंद्रयान-3 पर भारत ही नहीं पूरी दुनिया की नजर टिकी हुई है। बुधवार को चंद्रयान-3 ने एक और पड़ाव पार कर लिया है। चंद्रयान-3 ने आखिरी बार अपने ऑर्बिट को सफलता पूर्वक घटाया है। ऑर्बिट को घटाने की यह अंतिम प्रक्रिया है। जानकारी के मुताबिक इसरो इसे सुबह 8:30 बजे से शुरू किया। इसके बाद चंद्रयान-3 को चंद्रमा की 100 Km X 100 Km की गोलाकार कक्षा में लाया जाएगा। इस प्रक्रिया के लिए चंद्रायन-3 के थ्रस्टर कुछ देर के लिए फायर किए गए। अभी चंद्रयान 150 Km x 177 Km की ऑर्बिट में है। इस प्रक्रिया के अगले दिन यानी 17 अगस्त को चंद्रयान-3 के प्रोपल्शन मॉड्यूल को लैंडर से अलग किया जाएगा।

5 अगस्त को चंद्रमा की कक्षा में पहुंचा था यान
बता दें कि 14 जुलाई को लॉन्च होने के बाद चंद्रयान-3 ने 22 दिन का सफर पूरा कर 5 अगस्त को शाम करीब 7:15 बजे चंद्रमा की कक्षा में पहुंचा। तब यान चंद्रमा की ग्रैविटी में कैप्चर हो सके, इसके लिए उसकी स्पीड कम की गई थी। स्पीड कम करने के लिए इसरो वैज्ञानिकों ने यान के फेस को पलटकर थ्रस्टर 1835 सेकेंड यानी करीब आधे घंटे के लिए फायर किए। ये फायरिंग शाम 7:12 बजे शुरू की गई थी।

23 अगस्त को होगा लैंड
23 अगस्त को चंद्रयान-3 के लैंडर-रोवर की चंद्रमा की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग कराई जाएगी। चंद्रयान-3 लॉन्च होने के बाद इसके ऑर्बिट को 5, 6, 9 और 14 अगस्त को चार बार घटाया जा चुका है। चंद्रयान-3 के चांद की सतह पर लैंड करते ही भारत लैंडर उतारने वाला चौथा देश बन जाएगा। अब तक अमेरिका, रूस और चीन ने ही चंद्रमा की सतह पर अपने लैंडर उतारे हैं। इतना भी नहीं भारत पहला देश होगा जो चांद के दक्षिणी ध्रुव पर लैंड करेगा। भारत ने साल 2019 में चंद्रयान-2 मिशन के तहत लैंडर को उतारने का प्रयास किया था लेकिन आखिरी क्षणों में लैंडर से संपर्क टूट गया था और उसकी क्रैश लैंडिंग हो गई थी।

क्या है चंद्रयान-3 मिशन?
चंद्रयान-3 मिशन 14 जुलाई को श्री हरिकोटा स्पेस सेंटर से लॉन्च किया गया था। चंद्रयान-3 मिशन के तहत इसरो 23 अगस्त को शाम 5:45 बजे चांद के दक्षिणी ध्रुव पर सॉफ्ट लैंडिंग करने की कोशिश करेगा। चंद्रयान-3 अपने साथ एक लैंडर और एक रोवर लेकर गया है। लैंडर चांद की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग करने की कोशिश करेगा और सफल लैंडिंग होने के बाद रोवर चांद की सतह पर रसायनों की खोज करेगा। वैज्ञानिक चांद पर मौजूद रसायनों का अध्यन करेंगे और पृथ्वी और चांद के रिश्तों को समझने की कोशिश करेंगे।

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