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ऑपरेशन ब्लू स्टार: प्रधानमंत्री से आर्मी चीफ तक… किस-किसको चुकानी पड़ी कीमत?

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ऑपरेशन ब्लू स्टार ने देश बांटने का मंसूबा पाले बैठी नापाक ताकतों को सबक सिखाया। साल था 1984। पांच जून की रात से छह जून की सुबह तक यह ऑपरेशन चला। स्वर्ण मंदिर के अंदर इस कार्रवाई में जरनैल सिंह भिंडरावाले और उसका कमांडर रिटायर्ड मेजर जनरल शाबेग सिंह मारा गया। इस ऑपरेशन की पूरे देश को कीमत चुकानी पड़ी। उस वक्त की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की इस ऑपरेशन के पांच महीने के भीतर हत्या हो गई। वहीं दो साल बाद जनरल एएस वैद्य की हथियारबंद हमलावरों ने गोली मारकर हत्या कर दी। एएस वैद्य ऑपरेशन के दौरान देश के थल सेनाध्यक्ष थे।

1 सफदरजंग रोड से 1 अकबर रोड के लिए निकलीं इंदिरा
ऑपरेशन ब्लू स्टार के समय देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी थीं। ब्लू स्टार के बाद पंजाब में चरमपंथ तेजी से फैला। 31 अक्टूबर 1984 का दिन था। इंदिरा का उस दिन काफी बिजी शेड्यूल था। बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री बना रहे पीटर उस्तीनोव आए थे। इंदिरा इंटरव्यू के लिए तैयार होकर अपने आवास 1 सफदरजंग रोड से बगल के दफ्तर 1 अकबर रोड पर जाने के लिए निकलीं। गेट पर ही इंदिरा के सुरक्षा गार्ड एसआई बेअंत सिंह और संतरी बूथ पर कॉन्स्टेबल सतवंत सिंह मौजूद थे।

इंदिरा ने किया नमस्ते, बेअंत सिंह ने चलाई गोली
सतवंत के हाथ में स्टेनगन और बेअंत के हाथ में .38 बोर की सरकारी रिवॉल्वर थी। इंदिरा ने सतवंत और बेअंत को खुद नमस्ते किया। ऐसा वह पहले से करती आ रही थीं। बेअंत ने रिवॉल्वर इंदिरा गांधी पर तानी। इंदिरा के मुंह से निकला कि यह क्या कर रहे हो? तब तक बेअंत ने गोली चला दी। इंदिरा के पेट में पहली गोली लगी। इसके बाद चार और गोलियां बेअंत ने चलाईं। दूसरी ओर 22 साल के सतवंत सिंह की ओर चिल्लाकर बेअंत कहता है कि गोली मारो। इसके बाद सतवंत ने स्टेनगन से 25 गोलियां चलाईं। इंदिरा के जमीन पर गिरने के बाद भी सतवंत फायरिंग करता रहा।

31 अक्टूबर 1984, AIR का संदेश- नहीं रहीं इंदिरा
इसके बाद गोलियों से छलनी इंदिरा को अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) लाया जाता है। आरके धवन और सुरक्षाकर्मी दिनेश भट्ट इंदिरा को एंबेसडर की पिछली सीट पर लिटाते हैं। पिछली सीट पर बैठी सोनिया गांधी ने इंदिरा के सिर को अपने गोद में रखा। साढ़े नौ बजे के आसपास एंबेसडर एम्स पर रुकती है। इसके बाद इंदिरा का इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम किया जाता है। उनके चेस्ट और पेट की सर्जरी की जाती है। उन्हें 88 बोतल ओ-नेगेटिव खून भी चढ़ाया जाता है। लेकिन शरीर में हरकत नहीं होती है। राजीव गांधी उस समय पश्चिम बंगाल में प्रचार अभियान में जुटे थे। दोपहर दो बजकर 23 मिनट पर ऑल इंडिया रेडियो से इंदिरा गांधी की मौत की औपचारिक घोषणा की जाती है।

जनरल एएस वैद्य ने खींचा था ऑपरेशन का खाका
इंदिरा गांधी ने उस वक्त के सेनाध्यक्ष अरुण श्रीधर वैद्य को ऑपरेशन ब्लू स्टार का जिम्मा सौंपा। लेफ्टिनेंट जनरल के सुंदरजी के साथ मिलकर जनरल वैद्य ने ऑपरेशन ब्लू स्टार का खाका खींचा। मुकम्मल ऑपरेशन का सेहरा उनके सिर बंधा। लेकिन इसके साथ ही वह भिंडरावाले समर्थक कट्टरपंथियों के रेडार पर आ गए। जनरल वैद्य को इस खतरे का अंदेशा पहले से था।

​गोली पर मेरा नाम लिखा तो मुझ तक आएगी ही
जनरल वैद्य ने खुद ही कहा था कि दो युद्धों में भूमिका निभाने के बाद मैं खतरे से भाग नहीं सकता। अगर कोई गोली ही मेरी नियति है तो जिस पर मेरा नाम लिखा है, वो गोली मुझ तक आएगी ही। भारतीय सेना से जनवरी 1986 में रिटायरमेंट के बाद जनरल वैद्य पुणे के अपने बंगले में परिवार के साथ रहने लगे।

​10 अगस्त 1986 को जनरल वैद्य की हत्या
10 अगस्त 1986 को जनरल वैद्य पुणे के राजेंद्र सिंह जी रोड की मार्केट गए। बाजार में थोड़ा वक्त बिताने के बाद वह अपनी कार से वापस लौट रहे थे। इसी दौरान बाइक और स्कूटर पर सवार हमलावरों ने उनकी कार को घेरकर फायरिंग की। वैद्य के कंधे पर एक और सिर में दो गोलियां लगीं। अस्पताल में उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। उनकी पत्नी भानुमती और सुरक्षाकर्मी को भी गोलियां लगी थीं। खालिस्तान कमांडो फोर्स ने हत्या की जिम्मेदारी लेते हुए कहा था कि ब्लू स्टार को लीड करने की वजह से उनको निशाना बनाया गया।

केएस बराड़ थे पूरे ऑपरेशन के हीरो
ऑपरेशन ब्लू स्टार के हीरो के तौर पर कुलदीप सिंह बराड़ की गिनती भी होती है। लेफ्टिनेंट जनरल बराड़ ने अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में पूरे ऑपरेशन को लीड किया था। जब उनको ऑपरेशन का नेतृत्व करने की जानकारी मिली, उसके एक दिन बाद वह छुट्टियां बिताने के लिए मनीला जाने वाले थे। एक इंटरव्यू में बराड़ ने कहा था कि हमें अफसोस तो होता है कि ऐसा ऑपरेशन क्यों करना पड़ा। लेकिन जब देश के लोग ही पाकिस्तान से हाथ मिला लें तो क्या किया जा सकता है। मुझे सिर्फ इस बात की शांति है कि गोल्डेन टेंपल से गंदगी को साफ कर दिया।

ब्लू स्टार के बाद अपनों ने मुझसे नाता तोड़ लिया था
बराड़ ने 14 साल पहले बीबीसी को दिए इंटरव्यू में कहा था कि ब्लू स्टार के बाद उनके कई अपनों ने रिश्ता तोड़ लिया। बराड़ ने कहा था कि इंग्लैंड में रहने वाले मेरे मामा ने मुझसे रिश्ता तोड़ा और पूरी जिंदगी बात नहीं की। जब मेरे मामा मौत के करीब थे, तब जाकर उन्होंने मुझसे बात की थी। 11 साल पहले 30 सितंबर 2012 को लंदन में चार हमलावरों ने उनके गले पर चाकू मार दिया था। हालांकि गनीमत यह रही कि उनकी जान बच गई। केएस बराड़ ने इस ऑपरेशन के तीस साल बाद आत्मकथा लिखी- ऑपरेशन ब्लू स्टार द ट्रू स्टोरी। इसमें उन्होंने इस किताब में ऑपरेशन से जुड़े तमाम पहलुओं के बारे में बातें साझा की हैं।

ब्लू स्टार के बाद हुआ राजीव-लोंगोवाल समझौता
ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद अकाली दल के तत्कालीन अध्यक्ष संत हरचंद सिंह लोंगोवाल और प्रधानमंत्री राजीव गांधी के बीच एक समझौता हुआ। इसे राजीव-लोंगोवाल समझौते के रूप में जाना जाता है। 24 जुलाई 1985 यानी ब्लू स्टार के एक साल बाद यह समझौता हुआ। ब्लू स्टार में मारे गए निर्दोषों के परिवार को मुआवजा, सेना भर्ती में पंजाबियों को तवज्जो, अखिल भारतीय गुरुद्वारा अधिनियम और पंजाबी भाषा का प्रचार-प्रसार 11 प्वाइंट के इस समझौते के अहम बिंदु थे।

समझौते के 27 दिन बाद संत लोंगोवाल की हत्या
समझौते के बाद मशहूर कार्टूनिस्ट आरके लक्ष्मण ने एक कार्टून बनाया। अखबार में छपे इस कार्टून में दिखाया गया कि राजीव गांधी अपनी बुलेटप्रूफ जैकेट लोंगोवाल को सौंप रहे हैं। साथ ही राजीव उनसे कह रहे हैं कि संतजी इसे आप रखो, आपके काम आएगी। राजीव-लोंगोवाल समझौते के 27 दिन बाद 20 अगस्त 1985 को पटियाला से 90 किलोमीटर दूर उनकी हत्या हो गई। शेरपुर के एक गुरुद्वारे के पास खालिस्तान समर्थक आतंकियों ने गोली मारकर उनकी हत्या कर दी।

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