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सियाचिन ग्लेशियर से मिले सैनिक के अवशेष, 38 साल पहले बर्फीले तूफान में दब गए थे सेना के 8 जवान

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नई दिल्ली

सियाचिन ग्लेशियर में देश की रक्षा में तैनात सैनिक के अवशेष 38 साल बाद मिले हैं। भारतीय सेना में लांस नायक चंद्रशेखर 25 मई 1984 को आए बर्फीले तूफान में फंस गए थे। जिसमें एक ऑफिसर सहित 7 जवान लापता हो गए थे। लांस नायक चंद्रशेखर के अवशेष शनिवार को सियाचिन में गश्त कर रही एक टीम को मिले। लांस नायक चंद्रशेखर का परिवार उत्तराखंड के हल्द्वानी में रहता है और मंगलवार को उनके अवशेष हल्द्वानी पहुंचेंगे।

सियाचिन ग्लेशियर से पाकिस्तान की हरकत पर नजर रखते हैं सैनिक
सियाचिन ग्लेशियर में भारतीय सैनिकों की तैनाती इसलिए की गई क्योंकि पाकिस्तान ने वहां यथास्थिति बदलने की कोशिश की थी। 13 अप्रैल 1984 को भारतीय सैनिक ऑपरेशन मेघदूत के तहत वहां पहुंच गए। 13 अप्रैल 1984 को बिलाफोंड ला में तिरंगा फहरा दिया गया। चार दिन के भीतर यानी 17 अप्रैल तक सभीअहम जगहों पर भारतीय सैनिक काबिज हो चुके थे। ये टीम एयरलिफ्ट होकर सियाचिन पहुंची थी। इसके अलावा भारतीय सेना की 19 कुमांऊ के सैनिक सियाचिन पैदल पहुंचे थे। ये पहला दस्ता था जो 40 फीट ऊंची बर्फ में जोजिला पास क्रॉस कर पैदल सियाचिन पहुंचा।

गश्त के दौरान बर्फीले तूफान में दब गए थे कई जवान
भारतीय सेना के एक अधिकारी के मुताबिक 25 मई 1984 को भारतीय सेना की टीम सियाचिन में गश्त कर रही थी। जिसमें एक ऑफिसर और 7 जवान थे। अचानक आए बर्फीले तूफान में सब दब गए। यह सियाचिन में हुआ शायद पहला हादसा था। इनमें से पांच की बॉडी नहीं मिल पाई थी। 38 साल बाद शनिवार यानी 13 अगस्त को भारतीय सेना के गश्ती दस्ते को एक टूटे बंकर में एक कंकाल मिला। इसके साथ एक आइडेंटिटी डिस्क मिली।

जानें कैसे हुई सैनिक के अवशेष की पहचान
दरअसल हर भारतीय सैनिक किसी भी मिशन में जाते वक्त यह आइडेंटिटी डिस्क पहनता है जिसमें उसका आर्मी नंबर लिखा होता है। एल्युमीनियम की बनी इस डिस्क में पड़े नंबर से लांस नायक चंद्रशेखर की पहचान हो पाई। उस वक्त लांस नायक चंद्रशेखर 30 साल के थे। अब उनकी पत्नी 65 साल की हैं। उनकी दो बेटियां हैं। सियाचिन ग्लेशियर दुनिया का सबसे ऊंचा युदुध स्थल है और यहां मौसम ही जवानों का दुश्मन है। बर्फीले तूफान यहां सैनिकों की जान लेते रहते हैं। 1984 से अब तक सियाचिन ग्लेशियर में मौसम की मार की वजह से भारत और पाकिस्तान के 2000 से ज्यादा सैनिक अपनी जान गंवा चुके हैं।

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