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SC का सुभाष चंद्र बोस की मौत की जांच की मांग वाली अर्जी पर सुनवाई से इनकार, याचिका खारिज

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नई दिल्ली,

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मौत की जांच की मांग वाली जनहित याचिका खारिज कर दिया. इससे पहले साल के शुरुआत जनवरी में इसी याचिकाकर्ता ने नेताजी को राष्ट्रपुत्र घोषित करने की मांग करते हुए याचिका दाखिल की थी, जिसे अदालत ने खारिज कर दिया था. याचिका में कोर्ट से ये घोषणा करने की गुहार लगाई गई कि भारत को आजादी नेताजी की आजाद हिंद फौज के कारण मिली थी.

जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ के समक्ष याचिकाकर्ता पिनाकपाणि मोहंती के वकील ने कहा कि नेताजी के अगस्त 1945 में लापता होने पर अभी तक आधिकारिक तौर पर कोई भी अंतिम निष्कर्ष सामने नहीं है. उनकी मृत्यु एक रहस्य है, क्योंकि 1945 में हुई हवाई दुर्घटना में उनकी मौत नहीं हुई थी.

‘SC हर चीज की दवा नहीं है’
जस्टिस सूर्यकांत ने याचिकाकर्ता से कहा कि आपको उचित मंच पर जाना चाहिए. ये हमारा विषय नहीं है. यह मुद्दा कि एक आयोग सही था या दूसरा ये हम कैसे तय कर सकते हैं? ये तो नीति का विषय है. हम हर चीज़ के विशेषज्ञ नहीं हैं. आप राजनीतिक कार्यकर्ता हैं न तो अपनी पार्टी में जाइए और मुद्दा उठाइए. सुप्रीम कोर्ट हर चीज़ की दवा नहीं है. सरकार को चलाना कोर्ट का काम नहीं है. इन टिप्पणियों के बाद पीठ ने याचिका को खारिज कर दिया.

जनवरी में भी दायर की थी याचिका
इससे पहले साल के शुरुआत में जनवरी में इसी याचिकाकर्ता ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस को राष्ट्र का पुत्र घोषित करने की मांग वाली जनहित याचिका दायर की थी. तब भी जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने नेताजी की अप्रतिम देशभक्ति, सर्वोच्च बलिदान की भावना और उत्कट निष्ठा पर अपनी टिप्पणियों के साथ याचिका खारिज कर दी थी. उस जनहित याचिका (पीआईएल) पर विचार करने से इनकार करते हुए पीठ ने कहा था कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसे नेता “अमर” हैं, उन्हें न्यायिक आदेश के जरिए से मान्यता देने की जरूरत नहीं है.

कोर्ट ने कहा कि देश के स्वतंत्रता संग्राम में बोस की भूमिका को स्वीकार करने की घोषणा के लिए न्यायिक आदेश सही नहीं होगा, क्योंकि नेता जी जैसी महान शख्सियत कोर्ट से मान्यता की मोहताज नहीं है. नेता जी जैसे आदर्श वीर किसी भी अदालत से मान्यता या घोषणा देने से बहुत ऊपर और ऊंचे हैं. वो महान लोग हैं और सिर्फ हम ही नहीं, पूरा देश उनके जैसे नेताओं और बलिदानियों का ऋणी है.

पीठ ने 1997 के फैसले का हवाला देते हुए मोहंती से कहा कि उन्हें बोस के लापता होने या मौत से जुड़े मुद्दे नहीं उठाने चाहिए. ये सब सुप्रीम कोर्ट 1997 में पहले ही निपटा चुका है. कोर्ट ने तब भी याचिकाकर्ता मोहंती से कहा था कि उन्हें ऐसे मुद्दों को यहां उठाने से पहले उस फैसले को पढ़ना चाहिए था.

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