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उत्तराखंड के पहाड़ों में सालों से कहां दबा है परमाणु ‘बम’, फटा तो गंगा का क्या होगा?

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नई दिल्ली,

ये तो आप जानते हैं कि जब भी परमाणु बम का इस्तेमाल होता है तो उसका क्या असर होता है. जिस जगह ये विस्फोट होता है, उसके आस-पास का बड़ा इलाका कई सालों तक इससे प्रभावित रहता है. पहले परमाणु बम से कई लोग मारे जाते हैं और विस्फोट के कई साल बाद तक रेडिएशन इतना फैल जाता है कि लोग बीमार पैदा होते रहते हैं.

लेकिन, क्या आप ये जानते हैं कि ऐसी ही एक परमाणु डिवाइस कई सालों से उत्तराखंड के पहाड़ों में कहीं दबी है. ऐसे में जब भी वहां कोई प्राकृतिक आपदा आती है तो लोग सबसे पहले ये ही अंदाजा लगाते हैं कि कहीं वो परमाणु बम ब्लास्ट तो नहीं हो गया है.

अब सवाल है कि आखिर ये डिवाइस है कहां और कितनी खतरनाक है. साथ ही सवाल है कि आखिर वो क्यों दबाई गई थी और उसके दबाने की क्या कहानी है. तो जानते हैं इन सवालों के जवाब और साथ ही बताते हैं कि आखिर कभी वो परमाणु डिवाइस एक्टिव हो जाए तो तो क्या दिक्कत हो सकती है?

क्या है इस डिवाइस की कहानी?
बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका ने 1960 के दशक में भारत के साथ मिलकर चीनी परमाणु परीक्षणों और मिसाइलों की निगरानी के लिए हिमालय में परमाणु ऊर्जा से चलने वाले कुछ यूनिट लगाए थे. उस दशक में ही चीन ने 1964 में अपना पहला परमाणु उपकरण विस्फोट किया था.

ऐसे में भारत की नंदा देवी चोटी पर ये लगाने का फैसला किया गया था. इस मिशन में अक्टूबर 1965 में, भारतीय और अमेरिकी पर्वतारोहियों के एक समूह को इन परमाणु यूनिट को भारत की दूसरी सबसे ऊंची चोटी नंदा देवी पर लगाया जाना था.

इन डिवाइस में सात प्लूटोनियम कैप्सूल थे, जिनका वजन लगभग 57 किलोग्राम (125 पाउंड) था. इसे 7,816 मीटर (25,643 फीट) ऊंची चोटी पर लगाया जाना था. लेकिन, बर्फीले तूफान की वजह से पर्वतारोही टारगेट तक नहीं पहुंच पाए और उन्हें बीच से ही नीचे लौटना पड़ा. जब वे नीचे उतर रहे थे तो उन्हें बताया गया कि वो उन डिवाइस को किसी सुरक्षित स्थान पर किसी रॉक से बांधकर आ जाएं. ऐसे में उन्होंने एक छह फ़ीट लंबा एंटीना, दो रेडियो कम्यूनिकेशन सेट, एक पावर पैक और प्लूटोनियम कैप्सूल को रास्ते में छोड़ दिया.

इन पर्वतारोहियों में भारत के मशहूर पर्वतारोही मनमोहन सिंह कोहली भी थे, जो भारत के दल का नेतृत्व कर रहे थे. वहां से लौटने के बाद अगले साल फिर से इस मिशन को अंजाम दिया जाना था. ऐसा ही हुआ और टीम फिर से ऊपर गई, लेकिन जब वो वहां पहुंचे तो वहां ये डिवाइस नहीं थी. वहां से ये सामान गायब हो चुके थे. इसके लिए कई अभियान चलाए गए, लेकिन फिर भी इन्हें ढूंढा नहीं गया. कई विदेशी लेखकों ने भी इसका अपनी किताब में जिक्र किया है.

ब्लास्ट हो जाए तो क्या होगा?
बता दें कि रॉ के पूर्व अधिकारी आरके यादव ने भी इस बारे में किताब लिखी है. साथ ही उन्होंने किताब पर चर्चा करते हुए एक कार्यक्रम में बताया था कि हिरोशिमा में जो परमाणु बम ब्लास्ट हुआ था, उसमें जो रसायन करीब 6 किलो था, वो ही रसायन इन यूनिट में करीब 1 किलो है. ऐसे में अगर कभी ये फटता है या लीक होता है तो इससे गंगा पूरी दूषित हो जाएगी, क्योंकि ये काफी खतरनाक है.

बता दें कि साल 2021 में जब ग्लेशियर से उत्तराखंड में बाढ़ आई थी, उस वक्त भी वहां के लोगों ने ये ही अंदाजा लगाया था कि जब परमाणु यूनिट लंबे वक्त से दबा हुआ है, उसमें ब्लास्ट हो चुका है.

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