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Thursday, April 30, 2026
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महिला दिवस बस एक दिन क्यों? साजिश है महिलाओं को तारीख में बांधने की कोशिश

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आप सभी को महिला दिवस की शुभकामनाएं मिल चुकी होंगी। ऐसे-ऐसे लोगों ने भी याद किया होगा आपको, जो बाकी वक्त कहीं नजर नहीं आते। लेकिन, एक बार उन शुभकामनाओं को फिर से देखिए। क्या आपको नहीं लगता कि हर साल 8 मार्च को महिला दिवस मनाना महिलाओं के योगदान की अनदेखी है? बस एक दिन! क्या यही हैसियत है आधी आबादी की और कैलेंडर में बस इतना ही अधिकार?

परवरिश का फर्क
लोग Gender biased और Gender violence की बात करते हैं। महिला दिवस इस बहस से अलग कैसे? आखिर यह भी तो महिलाओं को ऐसे जाल में फंसा देता है, जहां वे बस इसी दिन का इंतजार किए बैठी रहती हैं। एक पुरुष को तो अपना कोई खास दिवस मनाने की जरूरत नहीं पड़ती। क्यों नहीं उसे याद दिलाना पड़ता कि उसका वजूद क्या है? क्योंकि उसकी परवरिश ऐसी है कि वह जानता है वह कौन है। उसे बचपन से बताया जाता है कि वह एक पुरुष है, इस घर को चलाने की जिम्मेदारी उस पर ही आनी है। उसे बताया जाता है कि वह ताकतवर है और इसीलिए उसे तब भी कमजोर नहीं दिखना, जब वह भीतर से टूटा हुआ महसूस कर रहा हो। ऐसे माहौल और संस्कारों के बीच पाला-पोसा गया लड़का जब तक पुरुष बनता है, तब तक बचपने की सीख उसके चरित्र का हिस्सा बन चुकी होती है। ऐसी ही परवरिश किसी लड़की को क्यों नहीं दी जा सकती?

पूर्वाग्रह का जश्न
परवरिश और परंपरा, इनकी वजह से ही आज महिलाओं के लिए एक दिन की जरूरत आ पड़ी। उन्हें पता भी नहीं चला कि कब उन्हें एक दिन में सीमित कर दिया गया, उनके हिस्से के बाकी दिनों को छीनकर। 8 मार्च को महिला होने का जश्न मनाना एक तरह से सामाजिक पूर्वाग्रह का जश्न मनाना है। वह पूर्वाग्रह जिसमें इस एक दिन की तरह महिलाओं की भूमिका को भी समेट दिया जाता है।

क्षमता की अनदेखी
गृहलक्ष्मी, यह वह उपाधि है, जिसे बहुत चाव से ग्रहण करती हैं महिलाएं। करीने से सजे किसी घर की तारीफ पर आमतौर पर श्रेय दे दिया जाता है उस घर की लड़कियों को। खाना अच्छा बना, तो श्रेय लड़कियों को। कपड़े साफ धुले, तो श्रेय लड़कियों को। दोस्तों के सामने अपनी पत्नी का परिचय पति ऐसे देता है, ‘इन्होंने ही घर संभाल रखा है।’ जकड़ लेती है ऐसी प्रशंसा। उसने घर तो संभाल रखा है, लेकिन बस घर ही क्यों? क्षमता तो उसकी और भी बहुत है। वह बाहर की भूमिकाओं को भी निभा सकती है और ऐसा लगातार साबित भी कर रही है। तो क्यों नहीं वह ऑफिस लक्ष्मी हो जाती, क्यों नहीं वह बिजनेस संभालती, क्यों नहीं भागीदार होती हर निर्णय में?

तोड़ना होगा दायरा
रामायण में जिक्र है लक्ष्मण रेखा का। वह रेखा लक्ष्मण ने खींची थी सीता की सुरक्षा के लिए। आज वही रेखा खुद महिलाओं ने ही खींच ली है अपने चारों तरफ। इस रेखा के भीतर वह एक अच्छी मां हैं, आज्ञाकारी पत्नी हैं, आदर्श बहू हैं, प्यारी बहन हैं। इस रेखा में वह सभी का ख्याल रखने वाली हैं, सिवाय अपने। इतने सारे जो पैमाने तैयार किए गए हैं महिलाओं के लिए, उन पर उन्हें शुरू से ही कसा जाने लगता है। और महिलाएं भी खुद को इन दायरों में ही देखती हैं। वे अपना आकलन पत्नी, मां, बहन वगैरह के आदर्श चरित्र से करने लगती हैं, लेकिन उनकी भूमिका बस यही तो नहीं। दुनिया इसके बाहर भी है और उसे देखने के लिए कई बार लक्ष्मण रेखा को पार करना पड़ता है।

हक से वंचित
महिला दिवस चालाकी है उस सोच की, जो महिलाओं को उनका हक नहीं देना चाहती। जिसकी हिस्सेदारी आधी है, उसे बस एक अंश पकड़ा कर और प्रशंसा की थोड़ी चाशनी लगाकर संतुष्ट करने की साजिश है यह। एक छोटा-सा उदाहरण है, गहनों का। माना गया है कि गहनों पर महिलाओं का ही अधिकार होता है। सजना-संवरना विशेषाधिकार है उनका। लेकिन, देखा जाए तो यह भी तरीका है उनके अधिकारों को सीमित करने का। महिलाएं गहनों की चमक में खो जाती हैं। उन्हें लगता है कि पुरुष की कमाई में उनका हिस्सा ये गहने भर हैं। वाकई, बस गहने? मान लीजिए कि किसी बिजनेसमैन की कुल संपत्ति 100 अरब डॉलर है। अगर वह अपनी पत्नी लिए 10 करोड़ डॉलर के गहने भी बनवाता है यानी करीब 8.27 अरब रुपयों के, तो भी वह उसकी कुल प्रॉपर्टी का महज 0.1 फीसदी ही हुआ। क्या इतना अधिकार पर्याप्त है?

डर पर काबू
जरूरी है कि महिलाएं अपनी बनाई हद से बाहर निकलें। वह निकलें इस डर से कि समाज क्या कहेगा। और यह भी डर कि कहीं उन्हें बुरी मां, बुरी पत्नी या बुरी बहू के रूप में तो याद नहीं किया जाएगा। इस बेवजह के डर की वजह से आप जो खो रहीं, उसकी कीमत गहनों के ढेर से बहुत ज्यादा है। महिला दिवस की असली सफलता तब है, जब इसे मनाने की ही जरूरत न पड़े। जब एक महिला को किसी एक खास दिन अपनी उपलब्धियों को न गिनना पड़े, न अभिमान करना पड़े अपने स्त्री होने पर और न लोग उसे शुभकामनाएं देकर स्पेशल महसूस कराने का प्रयास करें, क्योंकि जब ऐसा दिन नहीं होगा, तब साल के सारे ही दिन उसके होंगे।

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