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हालात बदल गए, जज्बात बदल गए… खराब खेलकर नहीं बल्कि अपने ही पैर में कुल्हाड़ी मारकर हारा था भारत

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नई दिल्ली

रोहित शर्मा अपने आंसू रोकने की कोशिश में लगे थे। रोते हुए मोहम्मद सिराज को जसप्रीत बुमराह सांत्वना दे रहे थे। केएल राहुल घुटनों के बल बैठ चुके थे। विराट कोहली ने कैप में अपना चेहरा छिपा लिया था। मोहम्मद शमी निराश होकर वापस चले गए। 19 नवंबर की रात वर्ल्ड कप का फाइनल हारने के बाद दुनिया के सबसे बड़े नरेंद्र मोदी स्टेडियम में भारतीय टीम की हालत कुछ ऐसी ही थी। खासतौर पर वो खिलाड़ी ज्यादा दुखी थे, जिनका ये आखिरी वर्ल्ड कप था! रोहित शर्मा वर्ल्ड कप के एक एडिशन में सबसे ज्यादा रन बनाने वाले कप्तान बने। कोहली ने अब तक किसी भी बल्लेबाज से ज्यादा रन बनाए। चार मैच नहीं खेलने के बावजूद शमी सबसे ज्यादा विकेट लेने वाले गेंदबाज रहे। मगर इस बातों का अभी कोई मतलब नहीं क्योंकि भारत को वर्ल्ड कप हारे 48 घंटे से ज्यादा का वक्त हो चुका है।

इतने प्रोफेशनल क्रिकेट वर्ल्ड में टॉप टीमों के पास टेक्नॉलीजी से लेकर तमाम आधुनिक सुविधाएं हैं, लेकिन आप हालातों को नहीं हरा सकते। ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ इस वर्ल्ड कप के लीग मैच में भारत की परिस्थितियां बिल्कुल सही थीं। फाइनल में उन्हीं हालातों ने ट्रॉफी से दूर कर दिया। पिच कितनी बदली इसका एक उदाहरण ये है कि कितनी बार मार्नस लाबुशेन ने सिंगल के लिए गेंद को स्क्वायर के पीछे धीरे से टहला दिया। ऐसे आसान सिंगल भारत नहीं ले पाया दोपहर में पिच इतनी धीमी थी कि गेंद पुरानी हो जाने पर सिंगल लेने के लिए बल्ले का फेस खोलने में ही जोखिम था। कोहली बिलकुल इसी तरीके से आउट हुए। पैट कमिंस की गेंद उनके स्टंप्स पर लगी।

अगर टॉस में रोहित के शब्द पर आपने गौर किया हो तो उन्होंने कहा था कि अगर वह जीतते तो पहले बल्लेबाजी करते। ऐसे में ये कहना गलत नहीं होगा कि भारतीय टीम हालातों को पढ़ नहीं पाई। भारत को उम्मीद थी कि पिच धीमी होती जाएगी और बॉल बाद में ज्यादा टर्न लेगी, जैसे कोलकाता में हुए ऑस्ट्रेलिया और साउथ अफ्रीका के बीच दूसरे सेमीफाइनल में हुआ। उन्हें उम्मीद थी कि ऑस्ट्रेलिया का लक्ष्य का पीछा करने वाली कमजोरी का फायदा टीम इंडिया को मिलेगा।

आप पीछे मुड़कर देख सकते हैं और कह सकते हैं कि भारत के तेज गेंदबाज ज्यादा कटर फेंक सकते थे। शायद स्पिनर गेंद को टर्न कराने की कोशिश करने के लिए हवा में धीमी गति से जा सकते थे क्योंकि पिच में कुछ भी नहीं था। या रविंद्र जडेजा से पहले सूर्यकुमार यादव पर ज्यादा भरोसा जताया जा सकता था, जो स्पिन को अच्छा खेलते भी हैं। खिलाड़ियों को भी पता है कि सबसे बड़ी खुशी के लिए, आपको सबसे बड़े दिल टूटने का जोखिम उठाना होगा।

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