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Friday, May 1, 2026
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पिता करगिल वॉर के हीरो, मां का गहना गिरवी, सरफराज से कम नहीं है ध्रुव जुरेल की कहानी

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राजकोट

ऋषभ पंत दिल्ली के गुरुद्वारे में रातें गुजारते हुए क्रिकेटर बने तो थंगरासू नटराजन की मां सड़क पर मीट बेचती थी। रिंकू सिंह के पिता घर-धर जाकर गैस सिलेंडर बांटते थे और ध्रुव जुरेल की कहानी हमारे सामने है। उनके पिता ने पूरी जिंदगी कंधे पर बंदूक टांगकर भारत की रक्षा करने में गुजारी तो करगिल वॉर में पाकिस्तान से लोहा भी लिया। यही नहीं, जुरेल को क्रिकेट किट दिलाने के लिए पैसे नहीं थे तो मां ने अपने गहने बेचे। तब जाकर आज यह बेटा भारत के लिए डेब्यू कर सका है। दिनेश कार्तिक ने उन्हें डेब्यू कैप पहनाई।

करगिल वॉर हीरो का बेटा, जिसने क्रिकेटर बनने का सपना देखा
यह अलग बात है कि उनके इस खास दिन पर अधिक चर्चा सरफराज की हो रही है, जो मुंबई के लिए डोमेस्टिक क्रिकेट में रनों की बारिश कर रहे थे, लेकिन आंकड़े और संघर्ष में करगिल वॉर हीरो का बेटा सरफराज से कहीं कम नहीं है। ध्रुव ने इंग्लैंड के खिलाफ राजकोट के निरंजन शाह स्टेडियम में खेले जा रहे तीसरे टेस्ट में केएस भरत को रिप्लेस किया। एक ओर सरफराज खान हैं, जिनके पिता नौशाद खान ने उन्हें इंटरनेशनल क्रिकेटर बनाने के लिए एंड़ी-चोटी का जोर लगा दिया।

पिता चाहते थे ध्रुव जुरेल इंडियन आर्मी जॉइन करें
उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी सरफराज को भारतीय क्रिकेट टीम का कैप पहने देखने के लिए दी तो ध्रुव जुरेल के पिता चाहते थे कि बेटा एनडीए का एग्जाम दे और बड़ा ऑफिसर बनकर उनकी ही तरह इंडियन आर्मी में देश की सेवा करे, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। आगरा के 23 वर्षीय क्रिकेटर ध्रुव जुरेल ने गुरुवार को राजकोट में इंग्लैंड के खिलाफ तीसरे टेस्ट में पदार्पण किया। टीम प्रबंधन ने केएस भरत की जगह उन्हें मौका देने का फैसला किया, जिन्होंने पिछले कुछ मैचों में अच्छा प्रदर्शन नहीं किया।

फिर ध्रुव जुरेल ऐसे बने इंटरनेशनल क्रिकेटर
ध्रुव के पिता नेम सिंह भारतीय सेना में रहे और हवलदार पद से रिटायर हुए। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, वह अपने बेटे की सफलता से रोमांचित हैं। वह इसे एक सपने के सच होने के रूप में मानते हैं और ध्रुव का समर्थन करने वाले सभी लोगों के आभारी हैं। नेम चाहते थे कि ध्रुव नेशनल डिफेंस अकैडमी (एनडीए) में शामिल हों और देश की सेवा करें, लेकिन क्रिकेट के प्रति ध्रुव का जुनून उन्हें एक अलग दिशा में ले गई। हालांकि, उनके परिवार में पहले कोई भी क्रिकेट नहीं खेलता था, लेकिन ध्रुव की प्रतिभा को जल्दी ही पहचान लिया गया और उनके पिता ने उनके कौशल को विकसित करने के लिए कोच परवेंद्र यादव की मदद मांगी।

पिता का आज भी याद है कैसे मां ने गिरवी रख दिया था गहना

उनके पिता उन बलिदानों को याद करते हैं जो उन्होंने अपने क्रिकेट सपनों का समर्थन करने के लिए दिए थे। ध्रुव के लिए पहला क्रिकेट किट खरीदने के लिए उनकी मां ने अपनी एकमात्र सोने की चेन भी गिरवी रख दी थी। आर्थिक परिस्थिति गवाही नहीं दे रही थी, लेकिन ध्रुव दृढ़ निश्चयी रहे और कड़ी मेहनत करते रहे। आज उसी मेहनत का रिजल्ट सामने है।

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