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Friday, March 13, 2026
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योगी के सामने मौर्य ने बंसल को बता दिया ‘मैन ऑफ द मैच’, यूपी BJP में चल क्या रहा है?

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लखनऊ:

मैं उत्तर प्रदेश में बीजेपी का प्रदेश अध्यक्ष था, इसलिए यहां मिली जीत का मुकुट माथे पर सज गया। लेकिन यूपी में जीत के सम्पूर्ण श्रेय का अधिकारी कोई है तो वह सुनील बंसल हैं। शून्य से शिखर तक ले जाने वाले।’ खचाखच भरे सभागार में यह बातें उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने कहीं। यहां सीएम योगी आदित्यनाथ भी मौजूद थे। मौका था पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी की चौथी पुण्यतिथि पर आयोजित कार्यक्रम का। साथ ही मौका यह भी था कि यूपी के संगठन महामंत्री पद से प्रमोट होकर बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव बनने के बाद सुनील बंसल का पहली बार लखनऊ आगमन हुआ। अब केशव के इस बयान के बाद उत्तर प्रदेश खासकर बीजेपी की अंदरूनी राजनीति को लेकर चर्चा का बाजार एक बार फिर से गरम हो गया है। सुनने में तो यह महज एक लाइन लगती है लेकिन गहरे उतरने पर उत्तर प्रदेश में बीजेपी के अंदर चल रही खींचतान का सार नजर आता है।

भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री सुनील बंसल नया पद मिलने के बाद सोमवार रात लखनऊ पहुंचे। मंगलवार की सुबह से बंसल से मिलने वालों का तांता लगा रहा है। मुख्य तौर पर उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य और ब्रजेश पाठक भी उनसे मिलने गए। इसके अलावा महामंत्री गोविंद नारायण शुक्ल और अन्य अहम लोग भी उनसे मिलने गए। गौरतलब है सुनील बंसल के संगठन महामंत्री के रहते हुए सरकार और संगठन के बीच कशमकश बनी हुई थी। सूत्रों की मानें तो केंद्रीय नेतृत्व चाहता था कि सुनील बंसल 2024 के लोकसभा तक उत्तर प्रदेश में बने रहें। लेकिन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस बात को लेकर राजी नहीं थे।

राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो यूपी बीजेपी में खेमेबाजी नई नहीं है। 2014 में बीजेपी को 80 में से 73 सीटों पर मिली रेकॉर्ड सफलता के बाद से सुनील बंसल का कद काफी बड़ा होता गया। उन्होंने पार्टी के अंदर अपने दम खम का परिचय तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेई को हटवाकर करवाया। उनकी जगह बंसल ने अपने करीबी केशव मौर्य को यूपी बीजेपी अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठाया। सीधा संदेश गया कि बंसल ही यूपी में शाह के सबसे खासमखास हैं। नेता से लेकर नौकरशाह तक सुनील बंसल के आगे हाजिरी लगाने लगे। बंसल को यूपी की राजनीति का चाणक्य कहा जाने लगा।

2017 में केशव और बंसल की जोड़ी को ही यूपी में जीत का श्रेय दिया गया। हालांकि योगी आदित्यनाथ ने कुर्सी पर बैठने के बाद से प्रभाव बढ़ाने और बंसल-केशव पर लगाम कसने की कोशिश शुरू की। 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद योगी ने सरकार के कार्य में संगठन के दखल को काफी कम कर दिया। भाजपा संगठन की बैठक में योगी और बंसल एक-दूसरे के बगल में बैठने के बावजूद शायद ही कभी संवाद करते नजर आए। यही स्थिति योगी और केशव के बीच राजनीतिक मंचों पर भी दिखी। दोनों के बीच दूरी स्पष्ट नजर आती रही।

2022 के विधानसभा चुनाव के बाद भी स्थिति बनी रही। प्रदेश संगठन में सुनील बंसल का रुतबा काफी हद तक कम होता नजर आया। अपनी सीट पर मिली हार के बाद से केशव प्रसाद मौर्य भी डाउन नजर आए। हालांकि डेप्युटी सीएम का उनका पद बरकरार रहा। चाहे डीजीपी मुकुल गोयल हों या फिर सीएम के ओएसडी अभिषेक कौशिक। बंसल के खास अधिकारी या तो किनारे लगा दिए गए या फिर उन्होंने केंद्र में जाने के लिए ऐप्लिकेशन डाल दिया। योगी के आर-पार के मूड में दिखने की वजह से यह चर्चा होने लगी कि बंसल अब खुद ही यूपी से किनारा करना चाह रहे हैं।

मूल रूप से राजस्थान के निवासी सुनील बंसल ने छात्र जीवन में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के साथ राजनीति की शुरुआत की। वह धीरे-धीरे सीढ़ियां चढ़ते गए। राजस्थान के बाद पंजाब और फिर दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव में भी बंसन ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हालांकि 2014 के लोकसभा चुनावों के बाद से उनका नाम संगठन के अलावा लोगों ने जानना शुरू किया। उस वक्त यूपी में अमित शाह की मदद के लिए RSS की तरफ से बंसल को भेजा गया। वह को-इंचार्ज बनकर यहां पर आए। यही वह समय था, जब अमित शाह और सुनील बंसल की पहली बार मुलाकात हुई।

सुनील बंसल ने 2014 लोकसभा चुनाव के बाद 2017 यूपी विधानसभा, 2019 लोकसभा चुनाव और फिर 2022 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी को प्रचंड जीत दिलाने का काम किया। यूपी में 2014 से पहले पार्टी संगठन की स्थिति बहुत दयनीय थी, लेकिन सुनील बंसल ने बूथ स्तर पर संगठन के ढांचे को मजबूत किया। यही वजह है कि उनकी बूथ से लेकर प्रदेश स्तर तक संगठन पर मजबूत पकड़ मानी जाती है। इतना ही नहीं, उन्होंने सोशल मीडिया पर ऐक्टिव मौजूदगी को भी खास हथियार बनाया।

पिछले 7-8 सालों के दौरान यूपी में बीजेपी संगठन में ‘बंसल राज’ चला। प्रदेश में पार्टी ने दो करोड़ से अधिक कार्यकर्ता बनाने के बाद बूथ लेवल पर मजबूत आधार देना शुरू हुआ। बंसल की अगुवाई में बूथ कमिटियों को मजबूती का काम शुरू हुआ। बीजेपी ने पूरे प्रदेश में 1 लाख 47 हजार बूथ में से 1 लाख 8 हजार बूथों पर शानदार प्रदर्शन किया। केंद्र में अमित शाह और यूपी में केशव प्रसाद मौर्य को सुनील बंसल का सबसे खास सहयोगी माना गया। अब बंसल की विदाई के बाद केशव की तरफ से उन्हें जीत का नायक बताए जाने से निकल रहा सियासी संदेश स्पष्ट है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पृष्ठभूमि से आने वाले केशव मौर्य काफी समय तक विश्व हिंदू परिषद से जुड़े रहे। 2012 के विधानसभा चुनाव में सिराथू से जीतने के 2 साल बाद ही 2014 में फूलपुर लोकसभा से सांसद चुन लिए गए। इसके बाद उन्हें यूपी बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष का दायित्व भी सौंपा गया, जब 2017 में भाजपा प्रचंड बहुमत के साथ यूपी की सत्ता पर काबिज हो गई। केशव को सीएम बनाए जाने की चर्चा भी होने लगी लेकिन सेहरा योगी आदित्यनाथ के सिर पर सजा। केशव को डेप्युटी सीएम बनाया गया। इस बार के चुनाव में केशव सिराथू से हार गए लेकिन डेप्युटी सीएम बनाए गए। उन्हें अब विधान परिषद का नेता सदन बनाया गया है।

नई भाजपा के विस्तार में सुनील बंसल को भी साझीदार माना जाता है, इस वजह से उनका कद भी बढ़ा। इसका सीधा असर सरकार और संगठन के फैसलों में भी साफ दिखता है। खासकर 2017 की पहली भाजपा सरकार में बंसल की छाप साफ नजर आई थी। सरकार की दूसरी पारी में भी मतभेद और समन्वय के सवालों के बीच भी कई चेहरों के चयन को बंसल से ही जोड़ा गया। टिकटों के वितरण से लेकर संगठनात्मक चेहरों के चयन तक के अहम फैसले दिल्ली में होते हैं, वहां भी उनकी राय हमेशा अहम रही है। इसलिए सुनील बंसल के जाने और रहने के तार बहुत से चेहरों के सियासी भविष्य के बनने- बिगड़ने से भी जुड़ते हैं।

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