प्रयागराज
उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर एक अहम निर्णय सुनाया है। हाई कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि किसी भी पोस्ट को केवल लाइक करना किसी भी प्रकार का आपराधिक कृत्य नहीं माना जा सकता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक कोई व्यक्ति किसी आपत्तिजनक पोस्ट को लिखता, साझा (शेयर) या प्रचारित नहीं करता है, तब तक केवल ‘लाइक’ करने को उसके आपराधिक इरादे से नहीं जोड़ा जा सकता है। इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस आदेश को सोशल मीडिया के उपयोगकर्ताओं के हितों से जोड़कर भी देखा जा रहा है।
हाई कोर्ट ने क्या कहा?
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण आदेश में कहा कि किसी पोस्ट को लाइक किया जाना अश्लील या भड़काऊ कंटेंट का प्रकाशन या प्रसारण नहीं माना जा सकता है। ऐसे मामलों में सूचना प्रौद्योगिकी एक्ट 2008 की धारा 67 लागू नहीं की जा सकती है। यह आदेश जस्टिस सौरभ श्रीवास्तव ने इसी प्रकार के मामले में आरोपी इमरान की याचिका पर दिया।
क्या है इमरान का मामला?
आईटी एक्ट के तहत इमरान के खिलाफ दर्ज केस में आगरा सीजेएम कोर्ट में आपराधिक कार्यवाही लंबित है। हाई कोर्ट ने इस आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने का आदेश जारी किया। दरअसल, इमरान ने अर्जी दाखिल कर मामले के आरोप पत्र, संज्ञान आदेश, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट आगरा के समक्ष लंबित आपराधिक वाद को रद्द करने की मांग की थी।
इमरान के खिलाफ मंटोला थाने में एफआईआर दर्ज थी। इमरान के खिलाफ सोशल मीडिया पर भड़काऊ संदेश पोस्ट करने का आरोप लगा था। आरोप है कि इस पोस्ट के कारण 600 से 700 लोगों की भीड़ बिना अनुमति जुट गई। इससे शांति भंग की आशंका उत्पन्न हुई।
कोर्ट का आया आदेश
मामले में हाई कोर्ट ने कहा कि अश्लील सामग्री का प्रकाशन या प्रसारण दंडनीय अपराध है। हालांकि, किसी पोस्ट या संदेश को प्रकाशित तब माना जाएगा, जब उसे पोस्ट किया जाए। हाई कोर्ट ने कहा कि किसी पोस्ट को प्रसारित तब माना जाएगा, जब उसे शेयर या रीट्वीट किया जाए। कोर्ट ने कहा कि किसी पोस्ट को लाइक करना न तो प्रकाशन है और न ही प्रसारण। इसलिए यह आईटी एक्ट की धारा 67 के तहत नहीं आता है।
