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बस कुछ मीटर दूर थी मंजिल, तस्‍वीरों में देखें बर्फीले तूफान की साइट जहां गईं 26 जानें

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4 अक्‍टूबर मंगलवार उत्तराखंड के लिए अमंगल साबित हुआ। नेहरू पर्वतारोहण संस्‍थान के 41 पर्वतारोहियों का दल उत्तरकाशी में द्रौपदी का डांडा पर्वत पर चढाई के दौरान एवलांच का शिकार हो गया। देखते-देखते पूरा दल बर्फ की मोटी चादर के नीचे दफन हो गया। इनमें से अब तक 12 को रेस्‍क्‍यू किया जा सका। अभी तक 26 लोगों के शव मिले हैं, जबकि 3 लापता हैं।हादसे के बाद थल सेना, वायुसेना, एनआईएम, भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी), हाई ऑल्टिट्यूड वारफेयर स्कूल (जम्मू-कश्मीर), राज्य आपदा मोचन बल और जिला प्रशासन तलाश अभियान में जुटे हैं। राहत और बचाव कार्य के दौरान वे पहली तस्‍वीरें सामने आईं जहां यह पूरा हादसा हुआ। इनमें देखा जा सकता है कि कहां पर वह दरार है जिसके अंदर पर्वतारोही और उनके ट्रेनर एवलांच के बाद फंस गए थे।

बस कुछ मीटर दूर थी चोटी
बचाव के दौरान मिले विजुअल्‍स से पता चलता है कि जिस समय यह हादसा हुआ उस समय यह पूरा समूह चोटी से महज 50 से 60 मीटर दूर रह गए थे। शुक्रवार को जारी तस्‍वीरों से पता चलता है जिस समय एवलांच उनके आकर टकराया उस समय पर्वतारोही द्रौपदी का डांडा पहाड़ की सीधी चढ़ाई शुरू ही करने वाले थे। इस तरह 17,500 फीट की ऊंचाई पर उनसे बर्फ की मोटी दीवार जा टकराई।

लगातार राहत कार्यों में लगे हैं जवान
थल सेना, वायुसेना, एनआईएम, भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी), हाई ऑल्टिट्यूड वारफेयर स्कूल (जम्मू-कश्मीर), राज्य आपदा मोचन बल और जिला प्रशासन तलाश अभियान में जुटे हैं। यह अभियान मंगलवार को हिमस्खलन के कुछ घंटों बाद शुरू हुआ था। हिमस्खलन में लापता हुए पर्वतारोही एनआईएम द्वारा उन्नत प्रशिक्षण पाठ्यक्रम के लिए चुने गए दल का हिस्सा थे।

सेना के जवान जान जोखिम में डालकर मौके पर पहुंचे
इस पूरे रेस्‍क्‍यू मिशन में सभी एजेंसियों की टीमें लगी हैं। सेना के जवान अपनी जान जोखिम डालकर हादसे वाली जगह पर पहुंचे हैं। एक बार एवलांच आने के बाद भी दूसरे एवलांच आने का खतरा बना रहता है। इसके बाद भले ही कितनी तैयारी हो प्रकृति की ताकत के आगे एक नहीं चलती।

मौसम बन रहा है सबसे बडी बाधा
लेकिन राहत और बचाव की इस पूरी कवायद में सबसे बड़ी मुश्किल मौसम की ओर से आ रही है। उत्तराखंड में तेजी बारिश का अलर्ट है। ऐसे में हादसे की जगह हेल‍िकॉप्‍टर लैंड कराने में मुश्किल आ रही है। शनिवार को एसडीआरएफ के कमांडेंट ने कहा कि मौसम को देखते हुए हम रेस्‍क्‍यू की हर मुमकिन कोशिश कर रहे हैं।

अब तक 26 लोगों की गई है जान
इस हादसे में 12 लोगों को जीव‍ित बचा लिया गया। शुक्रवार शाम तक 41 में से 26 लोगों के मारे जाने की पुष्टि हो गई है, जबकि 3 ट्रेनी अबतक लापता हैं। शनिवार सुबह 7 शवों को लेकर हेलिकॉप्‍टर आईटीबीपी के बेस पर पहुंचा है। इन सातों शवों की पहचान भी कर ली गई है। अब इनका पोस्‍टमॉर्टम करने के बाद इन्‍हें इनके परिवारों को सौंप दिया जाएगा।

इंतजार में आंखें पथरा गईं
41 पर्वतारोहियों के इस समूह में अधिकांश 25 से 35 साल की उम्र के थे। ये पश्चिम बंगाल, दिल्‍ली, तेलंगाना, तमिलनाडु, कर्नाटक, असम, हरियाणा, गुजरात, हिमाचल प्रदेश और उत्तरप्रदेश के अलावा उत्तराखंड के थे। लेकिन इनमें सबसे ज्‍यादा तादाद स्‍थानीय युवाओं की थी। इन युवाओं के परिजन आईटीबीपी कैंप और दूसरी जगहों पर इनकी खोज खबर का इंतजार कर रहे हैं। बहुतों को बुरी खबर मिल चुकी है, वे शवों का इंतजार कर रहे हैं। वहीं, तीन लोगों के परिवार अभी भी उम्‍मीद बांधे बैठे हैं।

जो बचकर लौटे वे शुक्र मना रहे
ऐसे में मन ही मन सवाल उठता है कि आखिर ये युवा क्‍यों गए थे अपनी जान जोखिम में डालने। इस सवाल का जवाब तो खैर वही दे सकते थे लेकिन नेहरू पर्वतारोहण संस्‍थान के अधिकारी ने कहा, ये लोग मुख्‍यत: अपने चरित्र को और मजबूत बनाने और विपरीत हालातों का सामना करने में पारंगत होने के लिए आते हैं। सोचिए, कैसे युवा होंगे वे जो जानबूझकर खतरों से खेलने उतर गए। ऐसे में कभी-कभी प्रकृति से सवाल पूछने का मन करता है, ‘क्‍या जरूरत थी इसकी…?’

कहीं पहले आया भूकंप तो नहीं है वजह
वैसे कुछ जानकारों का यह भी मानना है कि दो दिन पहले यानी 2 अक्‍टूबर को उत्तरकाशी में 2.5 तीव्रता का एक भूकंप आया था। इसका केंद्र हादसे वाली जगह से बहुत दूर नहीं था। बहुत मुमकिन है कि इस हलचल से ग्‍लेशियर में हल्‍की सी दरार पड़ गई हो और ज‍िसका भयावह नतीजा 4 अक्‍टूबर को आया वह एवलांच हो जिसकी चपेट में इतने परिवार आ गए।

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