बांदा
बुंदेलखंड क्षेत्र में दिवाली के समय एक पुरानी परंपरा आज भी कायम है, जिसमें गाय से सुअर को लड़ाने का रिवाज है। इस परंपरा को मौनिए दिवारी कहा जाता है, जिसमें ग्वालों के रूप में सजे युवक ढोल की थाप पर नाचते हैं और विशेष खेल आयोजित किया जाता है। इस खेल के दौरान एक सुअर को गाय के पैरों तले फेंक दिया जाता है, और गाय उसे पैरों से रौंदती है।
बताया जाता है कि ये लड़ाई तब तक चलती है, जब तक सुअर मर नहीं जाता या गंभीर रूप से घायल नहीं हो जाता। इस आयोजन में उपस्थित लोग शोर मचाते हैं, और फिर दिवारी नृत्य कर अपनी प्रसन्नता प्रकट करते हैं।
परेवा या दूज पर होती है लड़ाई
यह परंपरा विशेष रूप से बांदा और इसके आस-पास के ग्रामीण क्षेत्रों में दिवाली के अगले दिन गोवर्धन पूजा और भैया दूज के मौके पर निभाई जाती है। माना जाता है कि यह आयोजन बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। क्षेत्र के कई गांवों में यह परंपरा सदियों से चलती आ रही है। गांव के लोग इसे धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन मानते हैं। वे मानते हैं कि इस खेल में गाय आसुरी शक्तियों का प्रतीक माने जाने वाले सुअर को हराकर पवित्रता की विजय का संदेश देती है।
पूर्वजों से चली आ रही है परंपरा
इतिहासकार शोभाराम कश्यप के अनुसार, यह परंपरा पूर्वजों के समय से चली आ रही है। उनका मानना है कि भगवान श्रीकृष्ण ने गो का रूप धारण कर अपने खुरों से सुअर का वध किया था, जिससे यह रिवाज शुरू हुआ। यह परंपरा बुंदेलखंड में बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक बन गई। तभी से गोवर्धन पूजा के दिन इसे निभाया जाता है। आयोजन में ग्रामीण ढोल बजाते हैं, ग्वालों के रूप में सजते हैं, और दिवारी नृत्य करते हैं।
