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भारत-पाक तनाव के बीच शेयर बाजार में चुपचाप हो गया बड़ा ‘खेल’, 22 साल में पहली बार हुआ ऐसा

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नई दिल्ली

भारतीय शेयर बाजार में एक बड़ा बदलाव आया है। 22 साल में पहली बार घरेलू निवेशकों (DIIs) ने नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) में लिस्टेड कंपनियों में विदेशी निवेशकों (FPIs) से ज्यादा हिस्सेदारी खरीद ली है। इसका मतलब है कि अब भारतीय निवेशकों का भारतीय कंपनियों पर ज्यादा भरोसा है। यह बदलाव दिखाता है कि विदेशी निवेशक अब भारतीय शेयर बाजार में कम दिलचस्पी ले रहे हैं। शेयरों के दाम बहुत ज्यादा बढ़ गए हैं और कंपनियों की कमाई भी धीमी हो गई है। इसलिए विदेशी निवेशक अब भारत में अपने शेयर बेच रहे हैं।

एक रिपोर्ट के मुताबिक मार्च तिमाही में DIIs की हिस्सेदारी 0.73% बढ़कर 17.62% हो गई। वहीं, FPIs की हिस्सेदारी 0.02% घटकर 17.22% रह गई। दस साल पहले FPIs के पास 20.71% हिस्सेदारी थी जो DIIs, खुदरा निवेशकों और अमीरों की कुल 18.47% हिस्सेदारी से ज्यादा थी। पिछले पांच साल से घरेलू संस्थान जैसे म्यूचुअल फंड, बीमा कंपनियां और पेंशन फंड शेयर बाजार में खूब पैसा लगा रहे हैं। ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि बहुत सारे आम लोग अब फिक्स्ड डिपॉजिट और रियल एस्टेट जैसे परंपरागत निवेश साधनों से निकलकर शेयर बाजार में पैसा लगा रहे हैं। उन्हें शेयर बाजार में ज्यादा मुनाफा दिख रहा है।

क्यों बढ़ी हिस्सेदारी
आदित्य बिड़ला सन लाइफ म्यूचुअल फंड के मुख्य कार्यकारी ए. बालासुब्रमणियन ने कहा कि भारत में बचत करने का तरीका बदल गया है। अब ज्यादा लोग म्यूचुअल फंड, नेशनल पेंशन सिस्टम, बीमा और सीधे शेयरों में पैसा लगा रहे हैं। इस वजह से DIIs की इक्विटी में हिस्सेदारी बढ़ गई है। उनका मानना है कि DIIs की हिस्सेदारी और बढ़ेगी। साथ ही उन्हें यह भी उम्मीद है कि FPIs का निवेश भी बना रहेगा। जैसे-जैसे उभरते बाजारों में पैसा वापस आ रहा है, भारत में भी आ रहा है। साल की दूसरी छमाही में और ज्यादा निवेश आने की उम्मीद है।

मार्च तिमाही में निफ्टी50 इंडेक्स में 0.5% की गिरावट आई जबकि निफ्टी मिडकैप 150 और निफ्टी स्मॉलकैप 250 में क्रमशः 10% और 15% की गिरावट आई। FPIs ने मार्च तिमाही में ₹1.36 लाख करोड़ के शेयर बेचे जबकि DIIs ने लगभग ₹1.9 लाख करोड़ का निवेश किया। NSE में लिस्टेड कंपनियों में खुदरा निवेशकों की हिस्सेदारी 0.19% और अमीरों की हिस्सेदारी 0.11% कम हो गई।

प्राइम डेटाबेस ग्रुप के एमडी प्रणव हल्दिया ने कहा कि भारतीय पूंजी बाजार के लिए यह एक ऐतिहासिक क्षण है। SIP के जरिए खुदरा निवेशकों से आ रहे पैसे से भरे घरेलू म्यूचुअल फंड ने इसमें बहुत बड़ी भूमिका निभाई है। इन म्यूचुअल फंड ने पिछली तिमाही में ₹1.16 लाख करोड़ का शुद्ध निवेश किया है जिससे NSE में लिस्टेड कंपनियों में उनकी हिस्सेदारी पहली बार दोहरे अंकों में पहुंचकर 31 मार्च तक 10.35% हो गई है जो तीन महीने पहले 9.93% थी।

कैसे बदली तस्वीर
घरेलू बीमा कंपनियों ने भी इस दौरान ₹47,538 करोड़ की शुद्ध खरीदारी की। वैकल्पिक निवेश फंड और पोर्टफोलियो प्रबंधन सेवाओं ने क्रमशः ₹3,885 करोड़ और ₹1,137 करोड़ की शुद्ध खरीदारी की। घरेलू निवेशकों की बढ़ती भागीदारी से बाजार में काफी मजबूती आई है। अक्टूबर 2008 में जब विदेशी निवेशकों ने ₹16,000 करोड़ के शेयर बेचे थे तो बाजार 25% गिर गया था। लेकिन इस साल जनवरी में जब उन्होंने एक महीने में ₹87,000 करोड़ के शेयर बेचे, तो निफ्टी सिर्फ 2-3% ही गिरा। इससे पता चलता है कि भारतीय बाजार कितना मजबूत है।

फंड मैनेजरों ने कहा कि जब तक विदेशी निवेशक पूरी तरह से वापस नहीं आ जाते, तब तक DIIs की हिस्सेदारी ज्यादा रहेगी। यह तभी संभव है जब अमेरिका में 10 साल के सरकारी बॉन्ड की यील्ड 3.5% के स्तर तक गिर जाए। आशिका ग्लोबल फैमिली ऑफिस सर्विसेज के सह-संस्थापक अमित जैन ने कहा, ‘देश ने पिछले 25 साल में लगातार 7% का CAGR दिया है, जो विश्व स्तर पर एक असाधारण रिकॉर्ड है। इस लगातार वृद्धि ने निवेशकों के लिए ‘TINA’ (there is no alternative) फैक्टर बना दिया है, जो लंबी अवधि के अवसरों की तलाश में हैं।’

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