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सायरस मिस्त्री का हुआ दाह संस्‍कार, पारसियों ने क्यों बदली सैकड़ों साल पुरानी परंपरा

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मुंबई

शापूरजी पालोनजी ग्रुप के वारिस और टाटा संस के पूर्व चेयरमैन साइरस मिस्त्री की सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी। मंगलवार को उनका दाह संस्कार किया गया। उनका दाह संस्कार भी चर्चा में आया, जब उनका पारसियों की परंपरा से इतरदाह संस्कार किया गया। पारसी समुदाय के लोगों के शवों को टावर ऑफ साइलेंस पर छोड़ने की परंपरा रही है, जहां गिद्ध इन शवों को खा जाते हैं। इसे शव को आकाश में दफनाना भी कहा जाता है। लेकिन साल 2015 से पारसी समुदाय के बीच दाह संस्कार के तरीके में बदलाव आया है और मुंबई में इलेक्ट्रिक शवदाह गृह के जरिए दाह संस्कार के कई मामले सामने आए हैं।दुर्घटना में जान गंवाने वाले जहांगीर पंडोल के शव को मंगलवार को दक्षिण मुंबई के डूंगरवाड़ी में स्थित टॉवर ऑफ साइलेंस में छोड़ दिया गया, क्योंकि उनके परिवार ने दाह संस्कार के लिए पारंपरिक रीति- रिवाज को प्राथमिकता दी थी। वहीं सायस मिस्त्री का शव जलाया गया।

पारसी धर्म की तय रस्मों को पूरा करने के बाद पार्थिक शरीर को इलेक्ट्रिक मशीन के हवाले कर दिया जाता है। मंगलवार को सायरस मिस्त्री का दाह संस्कार भी ऐसे ही किया गया। मिस्त्री के पार्थिव शरीर को एक दशक पहले पारसी समुदाय के बनाए गए होटल के सामने स्थित शवदाह गृह ले जाया गया। यहां परिवार के एक पुजारी ने रस्मों का निर्वाह करने के बाद शव को इलेक्ट्रिक मशीन के हवाले कर दिया।

गिद्दों की संख्या में गिरावट
इस रूढ़िवादी समुदाय के कुछ लोगों ने शवों को खाने वाले गिद्धों की आबादी में गिरावट के कारण बीते एक दशक में शवदाह गृह बनाने का फैसला किया। मिस्त्री जैसे कई प्रगतिशील परिवारों ने अपने सदस्यों के दाह संस्कार के लिए नए तरीके को अपनाया है। रिपोर्ट के अनुसार, देश में गिद्धों की आबादी 1980 के दशक में 4 करोड़ थी, जो 2017 तक घटकर मात्र 19,000 रह गई। इसके चलते पारसी समुदाय के बीच दाह संस्कार का तरीका बदला है।

इसलिए गिद्दों की संख्या हुआ कम
सरकार ने गिद्धों की आबादी में गिरावट को रोकने के लिए राष्ट्रीय गिद्ध संरक्षण कार्य योजना 2020-25 के माध्यम से एक पहल शुरू की है, जिसमें कुछ सफलताएं मिली हैं। गिद्धों की आबादी में गिरावट के लिए मवेशियों के इलाज में इस्तेमाल की जाने वाली सूजन-रोधी दवा डाइक्लोफेनाक के उपयोग को जिम्मेदार ठहराया गया है। दरअसल जिन मवेशियों को यह दवा दी गई, उन मवेशियों को मरने के बाद गिद्धों ने खा लिया, जिससे गिद्धों की आबादी प्रभावित हुई।साल 2006 में इस दवा पर प्रतिबंध लगा दिया गया था, लेकिन तब तक इसका विनाशकारी प्रभाव गिद्धों की आबादी में गिरावट का कारण बन चुका था। गिद्धों की घटती आबादी ने पारसियों के लिए एक विकट चुनौती पेश की है।

महीनों खत्म नहीं हो पाता है शव
एक ओर जहां गिद्ध कुछ ही घंटों के भीतर शरीर पर से मांस को साफ कर देते हैं, वहीं कौवे और चील बहुत कम मांस खा पाते हैं, जिसके चलते कई शवों को खत्म होने में महीनों लग जाते हैं और उनसे बदबू फैलती है। पारसी समुदाय के लोंगो की संख्या में भी तेजी से गिरावट आ रही है। साल 2011 की जनगणना के अनुसार, देश में केवल 57,264 पारसी थे।

अग्नि मंदिर से लिंक
सरकार के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय ने समुदाय की आबादी में गिरावट को रोकने के लिए कई उपाय किए हैं, जिसमें जियो पारसी पहल शुरू करना शामिल है। 1000 साल पहले वर्तमान ईरान में उत्पीड़न से बचकर पारसी भारत के पश्चिमी तट पर पहुंचे थे। उन्हें एक ज्वाला मिली जिसके बारे में कहा जाता है कि वह दक्षिण गुजरात के उदवाडा में एक अग्नि मंदिर में अभी भी जलती है।

ऐसे होता है पारसियों का दाह संस्कार
पारसी धर्म में दाह संस्कार में शवों को ना तो हिंदुओं की तरह जलाया जाता है और ना ही मुस्लिम और ईसाई धर्म की तरह दफनाया जाता है। पारसी समुदाय में मौत के बाद व्यक्ति के शव को टावर ऑफ साइलेस पर रखा जाता है। यह एक गोलाकार ढांचा होता है। इसे दखमा भी कहते हैं। यहां शव रखने के बाद मृतक की आत्मा की शांति के लिए चार दिन प्रार्थना की जाता है। इस प्रार्थना को अरंध कहते हैं। यहां रखे शव को गिद्ध खाते हैं। यह पारसी समुदाय की परंपरा का हिस्सा है। पारसी धर्म में किसी शव को जलाना या दफनाना प्रकृति को गंदा करना माना गया है। पारसी धर्म में माना जाता है कि मृत शरीर अशुद्ध होता है। पारसी धर्म में पृथ्वी, जल और अग्नि को बहुत ही पवित्र माना गया है। इसलिए शवों को जलाना या दफनाना धार्मिक नजरिये से पूरी तरह से गलत है।

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