गौतम अडानी की बुनियाद कितनी मजबूत है, या कमजोर है। ये बहस जारी है। उधर बाजार में बिकवाली है। अडानी ग्रुप की फ्लैगशिप कंपनी अडानी एंटरप्राइजेज समेत बाकी सातों कंपनियों की हालत खस्ता है। हिंडनबर्ग रिसर्च ने चूलें हिला दी है। संसद से शेयर बाजार तक अडानी ग्रुप के कामकाजी तरीकों पर सवाल उठ रहे हैं। मेरा एक ही सवाल है। अगर हिंडनबर्ग की रिपोर्ट में दम नहीं है और वो फर्जी बातें बताकर अडानी के शेयरों को गिराना चाहता था ताकि शॉर्ट सेलिंग से फायदा हो सके तो टारगेट गौतम अडानी ही क्यों? हम इससे इनकार नहीं कर सकते कि पांच साल में 500 परसेंट विकास हर किसी का ध्यान खींचता है। और बुनियाद इतनी मजबूत ही होती, निवेशकों में इतना भरोसा ही होता तो 10 लाख करोड़ की बर्बादी होती क्यों? हिंडनबर्ग अगर खेल था तो पहली बार नहीं हुआ। और जिसमें दम था उसने ठोक कर ऐसे खेल का पासा पलट दिया।
कैसे, इसे उदाहरण के साथ समझाते हैं। 1992 स्कैम में हर्षद मेहता की कहानी आपने भी देखी होगी। मेरा मतलब दो साल पहले आई वेब सीरीज से है। इसमें आपने देखा होगा कैसे हर्षद भाई का सामना बेयर कार्टल यानी मंदड़िए मनु मानेक से होता है। हर्षद बाजार को उठाने वाला तेजड़िया था और मानु मानेक भयानक मंदड़िया। जिसे काट लिया उसे उठने का मौका नहीं मिलता। इसीलिए मानेक को ब्लैक कोबरा के नाम से लोग जानते थे। राकेश झुनझुनवाला और राधाकृष्ण दमानी उनके बाएं-दाएं हाथ थे। इसी कार्टेल ने एक खतरनाक षडयंत्र रचा। निशाने पर थे मुकेश अंबानी के पापा धीरूभाई अंबानी। ब्लैक कोबरा ने तय किया कि रिलायंस के शेयर को डस लिया जाए।
रिलायंस का आईपीओ
रिलायंस ने 1977 में आईपीओ लाने का फैसला किया। तब तक धीरूभाई प्राइवेट सेक्टर में देश के बड़े खिलाड़ी बन चुके थे। अक्टूबर 1977 में रिलायंस की लिस्टिंग के बाद एक साल के भीतर इसके एक शेयर का भाव 10 रुपए से 50 रुपए हो गया। 1980 में ये 104 रुपए पर चला गया। इसके दो साल बाद 186 रुपए पर परचम लहरा रहा था। तभी धीरूभाई के खिलाफ बीयर कार्टल सक्रिय होता है। ब्लैक कोबरा ने मौका देख धीरूभाई अंबानी को नीचे लाने का फैसला किया। इसी समय 1982 में रिलायंस ने डिबेंचर लाने का फैसला किया। बेयर कार्टल का टारगेट था इसे फेल करने का। जैसे कि हिंडनबर्ग ने अडानी के साथ करने की कोशिश की। अचानक मनु मानेक ने रिलायंस के शेयर बेचने शुरू कर दिए। यानी शॉर्ट सेलिंग शुरू कर दी। इसे ऐसे समझिए। आपने 180 के दाम पर शेयर बेच दिए। जब पैनिक फैला और मार्केट में सबने बिकवाली शुरू की तो भाव 120 पर आ गया। अब शॉर्ट पॉजीशन कवर कर लो। मतलब जितने शेयर बेचे थे उतने खरीद लो। सौदा बराबर और 60 टका का चकाचक मुनाफा।
कोबरा की चाल
रिलायंस की शॉर्ट सेलिंग कोलकाता में शुरू हुई। मार्च, 1982 में एक दिन ही साढ़े तीन लाख शेयर बेच दिए। देखते ही देखते रिलायंस का भाव आठ परसेंट गिर गया। लेकिन इसके बाद खेल हो गया। अचानक बेयर कार्टल के बेचे शेयरों को एनआरआई खरीदने लगा। ये खरीदने वाले सारे खाड़ी देशों के निवेशक थे। मानु मानेक की हालत खराब थी। उसने शेयर बेच तो दी लेकिन 14 दिन बाद सेटलमेंट के दिन आपको खरीदना भी पड़ेगा क्योंकि आपने तो बिना खरीदे शेयरे बेचे थे। तो मनु मानेक के पास दो ऑप्शन थे। या तो कम दाम पर बेचे शेयर ऊपर के भाव पर खरीदो। अगर ऐसा हुआ तो भारी घाटा होगा। इसलिए ब्लैक कोबरा ने मार्जिन देकर शेयरों को अगले सेटलमेंट तक खींचने की कोशिश की। लेकिन वो सफल नहीं हो पाए। जैसे ही खबर फैली रिलायंस में और तेजी आती है और भाव 201 रुपए पर चला जाता है। स्टॉक एक्सचेंज में संकट पैदा हो जाता है। बेयर कार्टल किसी तरह शेयर खरीद खरीद कर एनआरआई को डिलिवरी करने लगा।
चाणक्य निकले अंबानी
तभी एक ऐसा सच सामने आता है जिससे मानेक एंड कंपनी की वॉट लग जाती है। सेटलमेंट के लिए जो शेयर इन लोगों ने खरीदे उसे देने वाले धीरूभाई अंबानी ही थे। अंबानी इस खेल के चाणक्य निकले। वो पहले ही समझ गए थे कि भाव गिराने के पीछे कार्टल काम कर रहा है। और उन्होंने काउंटर अटैक का प्लान बना लिया। धीरूभाई ने अपने विदेशी पार्टनर्स से मदद मांगी। जैसे ही शॉर्ट सेलिंग शुरू हुई उन लोगों ने खरीदना चालू कर दिया। मात्र 150 रुपए में। और जब डिलिवरी सेटलमेंट डेट आई तो धीरूभाई ने ही ब्लैक कोबरा को ऊंचे भाव पर वो शेयर पकड़ा दिए। मतलब नहले पर दहला जिसने ब्लैक कोबरा का जहर उतार दिया। धीरूभाई बाजार के डॉन बन गए। कहा जाता है कि धीरूभाई ने किसी भी हालात से बचने के और उपाय भी कर लिए थे। उन्होंने विदेश से लगभग 100 करोड़ रुपए चार परसेंट ब्याज पर उठा लिए। ये तरीका था किसी भी गिरावट में अपने शेयरधारकों के हितों को बचाए रखने का। तब अपने देश में बैंकों का ब्याज 12 परसेंट था।
गौतम अडानी ने तो शेयर बाजार में हाहाकार से घबराकर 20 हजार करोड़ रुपए का फॉलो ऑन ऑफर वापस ले लिया। धीरूभाई भी चाहते तो डिबेंचर आगे के लिए खिसका सकते थे। लेकिन उन्होंने मैदान में उतर कर लड़ने का फैसला किया क्योंकि उनकी बुनियाद मजबूत थी। शेयरधारकों का समर्थन साथ था। अडानी के साथ ऐसा होता नहीं दिख रहा है।
