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मुकेश अंबानी की रिलायंस को कोर्ट से झटका, गैस विवाद में आए इस फैसले के बाद अब क्‍या होगा?

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नई दिल्‍ली:

मुकेश अंबानी की र‍ि‍लायंस इंडस्ट्रीज (RIL) को दिल्ली हाई कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। सरकार और रिलायंस के बीच लंबे समय से चले आ रहे गैस विवाद में अदालत ने सरकार का पक्ष लिया है। अदालत ने माना कि आरआईएल और उसके विदेशी साझेदारों ने धोखाधड़ी करके 1.729 अरब डॉलर से ज्‍यादा का अनुचित लाभ कमाया। उन्होंने ऐसे गैस भंडारों से गैस निकाली, जिन पर उनका कोई हक नहीं था। यह विवाद 2014 का है। तब ONGC ने आरोप लगाया था कि रिलायंस ने कृष्णा-गोदावरी (KG) बेसिन में अपनी सीमा के पास कुएं खोदे, जिससे गैस का रिसाव हुआ। रिलायंस के पास KG-D6 ब्लॉक में 60% हिस्सेदारी है, जबकि BP के पास 30% और Niko Resources के पास 10% हिस्सेदारी है। कोर्ट ने र‍िलायंस के पक्ष में आए एक अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के फैसले को भी रद्द कर दिया।

रिलायंस और सरकार के बीच गैस विवाद में नया मोड़ आ गया है। दिल्ली हाईकोर्ट ने सरकार के पक्ष में फैसला सुनाया है। जस्टिस रेखा पल्ली और सौरभ बनर्जी की खंडपीठ ने मई 2022 के एकल न्यायाधीश के फैसले को पलट दिया है। इससे पहले एकल न्यायाधीश ने पेट्रोलियम मंत्रालय के आरोपों को खारिज कर दिया था। अब हाईकोर्ट ने कहा है कि रिलायंस और उसके विदेशी साझेदारों ने ‘छिपी हुई धोखाधड़ी’ और 1.729 अरब डॉलर से ज्‍यादा का अनुचित लाभ कमाया। उन्होंने ऐसे गैस भंडारों से गैस निकाली जिस पर उनका हक नहीं था। अदालत ने 24 जुलाई, 2018 के अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता फैसले को भी रद्द कर दिया, जो RIL के नेतृत्व वाले संघ के पक्ष में था। अदालत ने कहा कि यह फैसला भारत की ‘सार्वजनिक नीति के विरुद्ध’ है। इस संघ में ब्रिटेन की BP Plc और कनाडा की Niko Resources भी शामिल हैं।

क्‍या है पूरा व‍िवाद?
यह विवाद 2014 में शुरू हुआ था। तब सरकारी कंपनी ONGC ने आरोप लगाया था कि RIL ने KG बेसिन में अपनी सीमा के पास कुएं खोदे थे। इससे ओएनजीसी के क्षेत्रों से गैस का रिसाव र‍िलायंस के क्षेत्र में हो गया। ओएनजीसी का दावा था कि 2009 और 2013 के बीच रिलायंस को इस गैस रिसाव से फायदा हुआ। रिलायंस, जिसके पास KG-D6 ब्लॉक का 60% हिस्सा है, का कहना था कि उसने उत्पादन प्रोडक्‍शन शेयरिंग कॉन्‍ट्रैक्‍ट (PSC) के अनुसार काम किया है। BP के पास इस ब्लॉक का 30% और Niko Resources के पास 10% हिस्सा है।

इस मामले की जांच के लिए दोनों कंपनियों ने अमेरिकी कंसल्टिंग एजेंसी DeGolyer and MacNaughton (D&M) को नियुक्त किया। D&M ने कहा कि र‍िलायंस के ब्लॉक डेवलपमेंट से गोदावरी PML ब्लॉक में मूल गैस की कमी हो सकती है।

2014 में सरकार ने आरआईएल से 1.47 अरब डॉलर की मांग की थी। सरकार का आरोप था कि आरआईएल ने ओएनजीसी के पास के ब्लॉक – गोदावरी PML और KG-DWN-98/2 – से बिना अनुमति के गैस निकाली और बेची। इसके बाद यह मामला कई अदालती और मध्यस्थता कार्यवाहियों से गुजरा।

सरकार का दावा हुआ था खार‍िज
सिंगापुर के मध्यस्थ लॉरेंस बू के नेतृत्व में तीन सदस्यीय न्यायाधिकरण ने जुलाई 2018 में 2-1 के फैसले से सरकार के दावे को खारिज कर दिया था। न्यायाधिकरण ने कहा कि अनुबंध ठेकेदार को बाहरी स्रोत से अनुबंध क्षेत्र में आए गैस को निकालने और बेचने से नहीं रोकता।

उसी साल सरकार ने इस मध्यस्थता फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी। मई 2023 में सरकार ने मध्यस्थता के फैसले को चुनौती देते हुए तर्क दिया कि यह फैसला सार्वजनिक नीति के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है और एक ऐसे ठेकेदार को लाभ पहुंचाता है। आरआईएल ने जवाब दिया कि संयुक्त विकास तभी निर्देशित किया जा सकता है जब दोनों तरफ गैस मौजूद हो, लेकिन हाइड्रोकार्बन महानिदेशालय (DGH) ने क्षेत्र विकास के विभिन्न चरणों के कारण संयुक्त विकास को तकनीकी रूप से अव्यवहारिक माना था।

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