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5 महीने में कर दिया बर्बाद, आगे और नुकसान या बदलेगी कहानी? एक्‍सपर्ट्स से समझ‍िए

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नई दिल्‍ली:

पिछले पांच महीनों में भारतीय शेयर बाजार में बड़ी गिरावट देखी गई है। प्रमुख सूचकांक एनएसई निफ्टी और बीएसई सेंसेक्‍स अपने सबसे ऊंचे स्तर से 14% और 13% से ज्यादा नीचे आ चुके हैं। इस गिरावट के कई कारण हैं। मसलन ऊंचे मूल्यांकन, विदेशी निवेशकों का पैसा निकालना, कंपनियों के कमजोर नतीजे और दुनियाभर में व्यापार को लेकर तनाव। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर कंपनियों का मुनाफा बढ़ता है और वैश्विक अर्थव्यवस्था स्थिर होती है तो बाजार में सुधार हो सकता है। लेकिन, वैश्विक स्तर पर महंगाई बनी रहती है और विदेशी निवेशक पैसा निकालते रहते हैं तो बाजार और गिर सकता है। वहीं, डॉयचे बैंक की बुधवार को जारी रिपोर्ट में उम्‍मीद जताई गई कि अर्थव्यवस्था का बुरा दौर खत्‍म हो चुका है। तीसरी तिमाही में जीडीपी ग्रोथ 6.2 फीसदी रहने का अनुमान है।

भारतीय शेयर बाजार को अक्सर देश की आर्थिक सेहत का पैमाना माना जाता है। पिछले कुछ महीनों से यह मुश्किल दौर से गुजर रहा है। 27 सितंबर को निफ्टी 26,277.35 और सेंसेक्‍स 85,978.25 के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने के बाद दोनों सूचकांकों में लगातार गिरावट आई है। पिछले पांच महीनों में निफ्टी अपने सबसे ऊंचे स्तर से 14.19% यानी 3,729.8 अंक नीचे आ गया है। सेंसेक्‍स भी 13.23% यानी 11,376.13 अंक लुढ़का है। इस गिरावट ने निवेशकों को चिंतित कर दिया है। वे बाजार के भविष्य को लेकर आशंकित हैं।

इस गिरावट के पीछे कई कारण हैं। हाई वैल्‍यूएशन, विदेशी निवेशकों (FII) का लगातार पैसा निकालना, कंपनियों के निराशाजनक तिमाही नतीजे और बढ़ता वैश्विक व्यापार तनाव, ये सभी फैक्‍टर बाजार पर दबाव बना रहे हैं।

क्‍या कह रहे हैं एक्‍सपर्ट्स?
मास्टर ट्रस्ट ग्रुप के निदेशक पुनीत सिंघानिया के अनुसार, ‘इस स्तर की गिरावट आमतौर पर कई फैक्‍टर्स के एक साथ आने से होती है।’ कई बड़ी कंपनियों के तिमाही नतीजे उम्मीद से कमजोर रहे। इससे निवेशकों का भरोसा कम हुआ। इसके अलावा, अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद टैरिफ की धमकियों और भारत की धीमी होती आर्थिक ग्रोथ ने भी बाजार को प्रभावित किया।

सिंघानिया के मुताबिक, ‘सेंसेक्‍स में अपने सबसे ऊंचे स्तर से 13 फीसदी से ज्यादा की तेज गिरावट देखी गई, जो विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) के भारतीय बाजार से निकासी करने, नकारात्मक तकनीकी संकेतकों, कमजोर तिमाही नतीजों और वैश्विक आर्थिक चिंताओं के कारण हुई।’

उन्होंने आगे कहा, ‘राष्ट्रपति ट्रंप की टैरिफ घोषणाओं के साथ कमजोर अमेरिकी आर्थिक आंकड़ों और महंगाई के जोखिम ने भी बाजार की अनिश्चितताओं को बढ़ाने का काम किया।’ एफआईआई लगातार भारतीय बाजार से पैसा निकाल रहे हैं।सिंघानिया के अनुसार, ‘अकेले 2025 में ही अब तक विदेशी फंड एक लाख करोड़ रुपये से अधिक निकासी कर चुके हैं।’ उन्होंने कहा, ‘अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये में आई कमजोरी, वैश्विक अनिश्चितताओं और महंगे इक्विटी मूल्यांकन से बाजार में अनिश्चितता बढ़ी है।’

FII की न‍िकासी पड़ रही है भारी
मेहता इक्विटीज लिमिटेड के सीनियर प्रेसिडेंट (रिसर्च) प्रशांत तापसे ने इस बात पर सहमति जताई कि एफआईआई की निकासी बाजार पर दबाव बना रही है। उन्होंने कहा, ‘एफआईआई की भारत से बाहर निकलने की रणनीति पर रोक लगने के कोई भी संकेत नहीं दिख रहे हैं। इसकी वजह से बाजारों पर भारी दबाव बना हुआ है। दरअसल, अधिक मूल्यांकन के कारण निवेशक यहां अपने इक्विटी निवेश को घटा रहे हैं।’ इस साल अब तक सेंसेक्‍स में 4.52% और निफ्टी में 4.64% की गिरावट आई है।

फॉरविस मजार्स इन इंडिया के पार्टनर अखिल पुरी ने एफआईआई की निकासी के पीछे के कारणों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा, ‘अमेरिकी बॉन्ड यील्‍ड बढ़ने, डॉलर में मजबूती, रुपये में कमजोरी और भारतीय शेयरों के बढ़े हुए मूल्यांकन ने विदेशी निवेशकों के बीच भारतीय शेयरों का आकर्षण घटा दिया है। इसकी वजह से विदेशी निवेशक यहां से निकासी कर रहे हैं।’ उन्होंने आगे कहा, ‘उपभोक्ता खंड, वाहन और निर्माण सामग्री सहित प्रमुख भारतीय क्षेत्रों की उम्मीद से खराब तिमाही रिपोर्ट से कंपनियों के मुनाफे पर संदेह पैदा हो रहा है।’

पुरी ने वैश्विक व्यापार युद्ध की आशंका को भी एक बड़ा जोखिम बताया। उन्होंने कहा, ‘बाजार पर मंडरा रहा एक बड़ा जोखिम वैश्विक व्यापार युद्ध की आशंका है। अमेरिका ने हाल ही में स्‍टील और एलुमीनियम आयात पर 25 फीसदी शुल्क लगाने की घोषणा की है जबकि अन्य वस्तुओं पर वह जवाबी शुल्क यानी रेसिप्रोकल टैरिफ लगाने पर विचार कर रहा है।’

भविष्य की संभावनाओं के बारे में सिंघानिया ने कहा, ‘अगर कंपनियों का लाभ बढ़ता है, वैश्विक अर्थव्यवस्था स्थिर होती है और भारत सरकार लाभकारी नीतियां लागू करती रहती है तो स्थिति सुधर सकती है। हालांकि, वैश्विक महंगाई दर ऊंची बनी रहती है, मंदी आती है या एफपीआई की निकासी जारी रहती है तो बाजार में और गिरावट भी आ सकती है।’

जियोजीत फाइनेंशियल सर्विसेज के शोध प्रमुख विनोद नायर ने बाजार में सतर्कता का माहौल बताया। उन्होंने कहा, ‘बाजार में सतर्कता का माहौल बना हुआ है। कंपनियों के नतीजों में उल्लेखनीय सुधार न होने के अलावा आसान वैश्विक तरलता और स्थिर मुद्रा के साथ अनुकूल माहौल न होने तक निराशावादी धारणा बनी रह सकती है।’

अर्थव्यवस्था का बुरा दौर खत्‍म
वहीं, डॉयचे बैंक की रिपोर्ट में कहा गया है कि दिसंबर तिमाही में जीडीपी ग्रोथ रेट 6.2 फीसदी रहने का अनुमान है। सितंबर तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की ग्रोथ सात तिमाहियों के निचले स्तर 5.4 फीसदी पर आ गई थी। इसके चलते अर्थव्यवस्था की मजबूती को लेकर चिंताएं थीं। बैंक के विश्लेषकों ने कहा, ‘जहां तक भारत की ग्रोथ का सवाल है, हमें लगता है कि सबसे खराब दौर खत्‍म हो गया है। हालांकि, आर्थिक गतिविधियों में सुधार के साथ भी जीडीपी ग्रोथ वित्त वर्ष 2025-26 में सात फीसदी की क्षमता से नीचे रहने का अनुमान है।’

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