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नीतीश राजनीति के इस दांव के सबसे बड़े खिलाड़ी, लालू, जॉर्ज से लेकर प्रशांत से ऐसे उठाया लाभ

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पटना

राजनीति में ना कोई स्थाई दोस्त होता है और ना ही स्थाई दुश्मन। समय और परिस्थिति के मुताबिक दोस्ती और दुश्मनी निभाने वाले को ही सफल राजनेता माना जाता है। बिहार में पिछले दो-तीन दशक की राजनीति पर नजर डालें तो नीतीश कुमार इस इस दांव के सबसे बड़े खिलाड़ी दिखते हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार समय और परिस्थिति को देखकर दोस्त और दुश्मन बनाने में माहिर हैं। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि लालू यादव बिहार के सबसे बड़े जन नेता हैं, लेकिन दिलचस्प यह है कि नीतीश कुमार ने इनसे भी अपनी सुविधा और नफा-नुकसान के हिसाब से दोस्ती और दुश्मनी की। आइए बिहार के उन बड़े चेहरों पर नजर डालते हैं जिन्हें नीतीश कुमार अपने राजनीतिक फायदे के लिए आजमाते रहे हैं।

एक जमाना था जब दलित पिछड़ों की लड़ाई के नायकों में लालू प्रसाद और नीतीश कुमार का बड़ा नाम था। कहते हैं कि लालू यादव के साथ-साथ नीतीश कुमार की राजनीति परवान पा रही थी। तब कांग्रेस के लोग इन्हें रंगा बिल्ला की जोड़ी के रूप में चर्चा करते थे। नीतीश कुमार को राजनीति में शरद यादव के करीब लाने में लालू यादव का बड़ा हाथ था। लालू यादव ने एक बार कहा भी था कि नीतीश कुमार की जीत के लिए अपराधी किस्म के दुलारचंद यादव तक को माला पहनाया। लेकिन एक समय आया जब नीतीश कुमार ने 1994 में लालू प्रसाद का ही साथ छोड़ कर चले गए। 1994 में सतीश कुमार के साथ गांधी मैदान में विशाल रैली की और समता पार्टी बनाई। लेकिन जब बीजेपी इनको राश नहीं आई, दो बार लालू प्रसाद का साथ पकड़ा। एक बार तो 2015 में लालू यादव के साथ सरकार बनाई और फिर 2017 में साथ छोड़ कर बीजेपी के साथ सरकार बनाई। लेकिन 2022 में एक बार फिर वह लालू प्रसाद के पास गए और राज्य में आरजेडी के साथ सरकार बनाई।

जॉर्ज फर्नांडिस और नीतीश
समता पार्टी को खड़ा करने में जॉर्ज फर्नांडिस, दिग्विजय सिंह, शिवानंद तिवारी का बड़ा हाथ था। पर 2004 में नीतीश कुमार ने जॉर्ज को मुज्जफरपुर से टिकट ही नहीं दिया। अंततः वह निर्दलीय चुनाव लड़े।

नीतीश और ललन सिंह
जनत दल यू (जेडीयू) जैसे राजनीतिक प्लेटफार्म बनाने में नीतीश की साथ-साथ ललन सिंह भी खड़े रहे। पर नाराजगी जब बढ़ी तो ललन सिंह को पार्टी छोड़ना पड़ा। तब ललन सिंह ने पार्टी छोड़ी और कांग्रेस में चले गए। 2010 के विधान सभा चुनाव में ललन सिंह कांग्रेस की तरफ से प्रचार भी किए थे। फिर 2013 में नीतीश कुमार ने ललन कुमार को साथ कर लिया। आगे की राजनीति में नीतीश कुमार के साथ हो गए। और वे जेडीयू ने अभी नंबर वन के पद पर हैं।

नीतीश कुमार और उपेंद्र कुशवाहा
जनता दल यू में भी सक्रिय भूमिका में उपेंद्र कुशवाहा थे। दोनों के बीच की नाराजगी बढ़ी और उपेंद्र कुशवाहा 2007 में अलग हुए। एनसीपी की राजनीति की। और 2010 में वापस जेडीयू में आये नीतीश कुमार ने उन्हें राज्यसभा भेजा। 2011 में जेडीयू से फिर अलग हुए। 2013 में रालोसपा बनाई। एनडीए के गंठबंधन में शामिल हुए। 2018 में एनडीए भी छोड़ा। 2020 में आरजेडी के अलायंस में चुनाव में उतरे। हार हुई। 2021 में नीतीश कुमार ने फिर जेडीयू में शामिल कर लिया।

नीतीश और प्रशांत किशोर
नीतीश कुमार और प्रशांत किशोर की जोड़ी बनी 2015 में। विधानसभा चुनाव में सफलता मिली। प्रशांत किशोर पार्टी में राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी बने। लेकिन फिर किसी बात में मतांतर हुआ। पार्टी छोड़ी दी। इन दिनों दोनो के बीच काफी तीखी बयानबाजी भी हुई। लेकिन गत सप्ताह पवन वर्मा के सहयोग से प्रशांत किशोर और नीतीश फिर मिले। क्या बात हुई इसका खुलासा तो नही हुआ। लेकिन राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि नमो के विरुद्ध गोलबंदी के ईशु पर बात हुई। हालांकि इस फलसफे पर सूची काफी लंबी है। दिग्विजय सिंह, शिवानंद तिवारी, सतीश कुमार और अरुण कुमार का भी नाम प्रमुखता से जुड़ा है। इस अभियान में एक नाम आर सी पी सिंह का जुड़ा है। पता नहीं राजनीति के इस सफर में कब नीतीश कुमार को इनकी जरूरत हो।

 

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