– संचालक मंडल की बैठक में नदारद रहे छ: संचालक,एक-दूसरे पर फोड़ रहे हैं ठीकरा
भोपाल
मध्यप्रदेश में बुलंदियों को छूने वाली भेल की बीएचईई थ्रिफ्ट एंड को-ऑपरेटीव सोसायटी पिछले नौ माह से भगवान भरोसे चल रही है जो लोग इस संस्था में बैठकर करोडों का कारोबार कर रहे हैं वह न तो इसका चुनाव करा पाये और न ही आम सभा । यही नहीं संचालक मंडल की बैठक में टांय-टांय फिस हो गई है । इस संस्था के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है । सत्ताधारी दो गुटों में बंटे हैं । इसके चलते नौ माह से संस्था के चुनाव भी नहीं हो पाये रही बात विपक्ष के संचालकों की तो वह इस दुर्दशा पर आंखे बंद किये हुये बैठे हैं । ऐसे में संस्था के करीब 4500 सौ सदस्य सिर्फ सोशल मीडिया पर बैठकर आनंद ले रहे हैं ।
इधर संस्था के कर्ता-धर्ता करोड़ों के लेनदेन पर साईन पर साईन किये जा रहे हैं । संस्था के नियम क्या हैं कैसे संस्था को चलाना चाहिये ऐसा लगता है किसी के भी समझ में नहीं आ रहा है । कहां-कहां से खरीदारी हो रही है । वित्तीय लेखा-जोखे की क्या स्थिति है और बैंलेस शीट कहां है इसे बताने की कोई जरूरत ही नहीं समझ रहा है । इसके पीछे किसका लाभ शुभ जुड़ा है इसके लिये भेल के अधिकारी भी संस्था के सदस्य होने के बाद भी हस्तक्षेप करने से कतरा रहे हैं । अपनी ही जमा पूंजी की जानकारी न लेना अजीबों गरीब बात है । यदि संस्था सवां सौ करोड़ की मान ली जाये तो सौ करोड़ का ऋण बांट देना किसी के गले नहीं उतर रहा है ।
साफ जाहिर है कि संस्था भगवान भरोसे ही चल रही है । सोशल मीडिया पर यह सब देखा जा सकता है । पीछले शनिवार आम सभा के लिए थ्रिफ्ट सोसायटी के संचालक मंडल की बैठक तीसरी बार आहूत की गई। जिसमें इस बार भी कोरम पूरा न होना आश्चर्य की बात है इस बैठक में आम सभा को लेकर अहम चर्चा होनी थी । बैठक में सिर्फ अध्यक्ष बसंत कुमार, संचालक सतेन्द्र कुमार और राम नारायण गिरी मौजूद थे।
वहीं उपाध्यक्ष गौतम मोरे, सचिव कमलेश नागपुरे, संचालक राजेश शुक्ला, भीम धुर्वे राजकुमारी सैनी एवं संजय गुप्ता गैरहाजिर रहे। इस बैठक को नहीं होने से आम सभा की तारीख तय नहीं हो पाई। साथ ही सदस्यों को मिलने वाला लाभांश का फैसला भी नहीं हो सका। सदस्यों एवं उनके प्रतिभावान बच्चों को सम्मानित किया जाता रहा है जो कोरोना के कारण पिछले दो वर्षों से रुका हुआ है, वह भी फिलहाल टल सा गया। गौरतलब है कि थ्रिफ्ट सोसायटी का कार्यकाल जनवरी 2022 यानी नौ महीने पहले सामप्त हो चुका है। जिसके बाद से अब तक चुनाव नहीं कराया गया। इन बीते नौ महीनों में एक दूसरे पर सिर्फ आरोप लगाते रहे। इस दौरान कुछ लोगों से बात करने पर उनका कहना था कि अध्यक्ष चुनाव नहीं कराना चाहते, बार-बार बहाना बनाकर चुनाव को टाल रहे हैं।
वहीं अध्यक्ष की माने तो संचालक मंडल के कुछ सदस्य चुनाव को प्रभावित कर रहे हैं। राजनीति का अखाड़ा बनी संस्था के भविष्य को लेकर कुछ सदस्य परेशान हैं वह कानूनी दांवपेच से वाकिफ नहीं हैं । सहकारिता के क्षेत्र में अपना परचम लहराने वाली संस्था गहरे संकट में दिखाई दे रहीे है । जानकार इसको लेकर काफी चिंतित है । जब संचालक मंडल ही अपना कोरम पूरा नहीं कर पा रहे हैं तो वैधता वैसे ही समाप्त मानी जा सकती है। आम सभा इस संस्था का अहम हिस्सा है वह अधर में है तो चुनाव का तो दूर-दूर तक पता नहीं ऐसे में उच्चस्तरीय कार्यवाही के बाद ही संस्था को बचाया जा सकता है ।
